Literature

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कुमारी

Amrita Pritam

मैंने जब तेरी सेज पर पैर रखा था
मैं एक नहीं थी--- दो थी
एक समूची ब्याही
और एक समूची कुंवारी
तेरे भोग की खातिर ..
मुझे उस कुंवारी को कत्ल करना था
मैंने ,कत्ल किया था --
ये कत्ल
जो कानूनन ज़ायज होते हैं ,
सिर्फ उनकी जिल्लत
नाजायज होती है |
और मैंने उस जिल्लत का
जहर पिया था
फिर सुबह के वक़्त --
एक खून में भीगे हाथ देखे थे ,
हाथ धोये थे --
बिलकुल उसी तरह
ज्यूँ और गंदले अंग धोने थे ,
पर ज्यूँ ही मैं शीशे के सामने आई
वह सामने खड़ी थी
वही .जो मैंने कत्ल की थी
ओ खुदाया !
क्या सेज का अँधेरा बहुत गाढा था ?
मुझे किसे कत्ल करना था
और किसे कत्ल कर बैठी थी ..

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हम मेहनतकश

Faiz Ahmed Faiz

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।
यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे।
वो सेठ व्‍यापारी रजवारे, दस लाख तो हम हैं दस करोड,
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे।
जो खून बहे जो बाग उजडे जो गीत दिलों में कत्‍ल हुए,
हर कतरे का हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे।
जब सब सीधा हो जाएगा, जब सब झगडे मिट जायेंगे,
हम मेहनत से उपजायेंगे, बस बांट बराबर खायेंगे।
हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।

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Kalahandi

Dr. Jagannath Prasad Das

Put away the road maps now.
To go there.
You do not need helicopters any more:
wherever there is hunger, Kalahandi is there.
The god of rain turned away his face.
There was not one green leaf left on trees to eat.
The whole village a graveyard
The ground, cracked 
River sand, dried up.
All plans failed;
the poverty line receded further.
Wherever you look,There is a Kalahandi:
In the sunken eyes of living skeletons,
in rags which do not cover frail bodies,
in utensils pawned off for food,
in the crumbling hutswith un thatched roofs,
in the exclusive prosperity
of having owned two earthen pots.
Kalahandi is everywhere:
in the gathering of famished crowds before charity kitchens,
in market places where children are auctioned off, 
in the sigh of young girls sold to brothels,
in the silent processions of helpless people leaving their hearth and home.
Come, look at Kalahandi closer:
In the crocodile tears 
Of false press statements, 
in the exaggerated statistics 
Of computer print-outs,
in the cheap sympathies 
doled out at conferences, 
in the false assurances presented by planners.
Kalahandi is very close to us:
In the occasional contrition of our souls,
in the unexpected nagging of conscience,
in the rare repentance of the inner self.
In the nightmares 
appearing through sound sleep,
in disease,
in hunger,
in helplessness,
in the abject fear
of an impending bloodshed.
How could we then walk
Into celebrated portals 
of the twenty-first century,
leaving Kalahandi behind?

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

Dushyant Kumar

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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आज मुझसे दूर दुनियाँ

Harivansh Rai Bachchan

भावनाओं से विनिर्मित
कल्पनाओं से सुसज्जित
कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनियाँ
आज मुझसे दूर दुनियाँ
बात पिछली भूल जाओ
दूसरी नगरी बसाओ
प्रेमियों के प्रति रही है, हाय कितनी क्रूर दुनियाँ
आज मुझसे दूर दुनियाँ
वह समझ मुझको न पाती
और मेरा दिल जलाती
है चिता की राख कर में, माँगती सिंदूर दुनियाँ
आज मुझसे दूर दुनियाँ

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तेरे बिन ये पहला-दिन

Ikram Rajasthani

तेरे बिन ये पहला-दिन,
सूना-सूना निकला दिन।
सूरज किरनें धूप वही,
फिर भी बदला बदला दिन।
तेरे साये, ढूंढ़ रहा है,
कैसा है ये पगला दिन।
तनहाई के सन्नाटों में,
घूमा झुंझला-झुंझला दिन।
शाम तलक तड़पा यादों में,
फिर मुश्किल से सम्भला दिन।

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वीरों का कैसा हो वसंत

Subhadra Kumari Chauhan

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान;
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का कैसा हो वसंत
गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत
कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का कैसा हो वसंत
हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड;
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का कैसा हो वसंत
भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

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आज एक आकाश नीचे उतर आया

Dr. Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया
करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी,
अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा,
चित्त हुआ सरल, जो था कातर सा,
तन मन हुए भारहीन ,
निज पर की सीमा मिटी,
संकल्प विकल्प सारहीन ,
चेतना की सब धाराएं अंतर को प्रवाहित सी,
कुण्डलिनी ज्यूँ स्वयं की धुरी पर समाहित सी,
प्रेम बना दृष्टि, संवाद भी !
प्रतीक्षा बनी स्वभाव...
आज एक आकाश नीचे उतर आया...

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An Indian Love Song

Sarojini Naidu

HE

Lift up the veils that darken the delicate moon
of thy glory and grace,
Withhold not, O love, from the night
of my longing the joy of thy luminous face,
Give me a spear of the scented keora
guarding thy pinioned curls,
Or a silken thread from the fringes
that trouble the dream of thy glimmering pearls;
Faint grows my soul with thy tresses' perfume
and the song of thy anklets' caprice,
Revive me, I pray, with the magical nectar
that dwells in the flower of thy kiss.

SHE

How shall I yield to the voice of thy pleading,
how shall I grant thy prayer,
Or give thee a rose-red silken tassel,
a scented leaf from my hair?
Or fling in the flame of thy heart's desire the veils that cover my face,
Profane the law of my father's creed for a foe
of my father's race?
Thy kinsmen have broken our sacred altars and slaughtered our sacred kine,
The feud of old faiths and the blood of old battles sever thy people and mine.

HE

What are the sins of my race, Beloved,
what are my people to thee?
And what are thy shrines, and kine and kindred,
what are thy gods to me?
Love recks not of feuds and bitter follies,
of stranger, comrade or kin,
Alike in his ear sound the temple bells
and the cry of the muezzin.
For Love shall cancel the ancient wrong
and conquer the ancient rage,
Redeem with his tears the memoried sorrow
that sullied a bygone age.

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कुमारी

Amrita Pritam

मैंने जब तेरी सेज पर पैर रखा था
मैं एक नहीं थी--- दो थी
एक समूची ब्याही
और एक समूची कुंवारी
तेरे भोग की खातिर ..
मुझे उस कुंवारी को कत्ल करना था
मैंने ,कत्ल किया था --
ये कत्ल
जो कानूनन ज़ायज होते हैं ,
सिर्फ उनकी जिल्लत
नाजायज होती है |
और मैंने उस जिल्लत का
जहर पिया था
फिर सुबह के वक़्त --
एक खून में भीगे हाथ देखे थे ,
हाथ धोये थे --
बिलकुल उसी तरह
ज्यूँ और गंदले अंग धोने थे ,
पर ज्यूँ ही मैं शीशे के सामने आई
वह सामने खड़ी थी
वही .जो मैंने कत्ल की थी
ओ खुदाया !
क्या सेज का अँधेरा बहुत गाढा था ?
मुझे किसे कत्ल करना था
और किसे कत्ल कर बैठी थी ..

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हम मेहनतकश

Faiz Ahmed Faiz

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।
यां पर्वत-पर्वत हीरे हैं, यां सागर-सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे।
वो सेठ व्‍यापारी रजवारे, दस लाख तो हम हैं दस करोड,
ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे।
जो खून बहे जो बाग उजडे जो गीत दिलों में कत्‍ल हुए,
हर कतरे का हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे।
जब सब सीधा हो जाएगा, जब सब झगडे मिट जायेंगे,
हम मेहनत से उपजायेंगे, बस बांट बराबर खायेंगे।
हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे,
इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।

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Kalahandi

Dr. Jagannath Prasad Das

Put away the road maps now.
To go there.
You do not need helicopters any more:
wherever there is hunger, Kalahandi is there.
The god of rain turned away his face.
There was not one green leaf left on trees to eat.
The whole village a graveyard
The ground, cracked 
River sand, dried up.
All plans failed;
the poverty line receded further.
Wherever you look,There is a Kalahandi:
In the sunken eyes of living skeletons,
in rags which do not cover frail bodies,
in utensils pawned off for food,
in the crumbling hutswith un thatched roofs,
in the exclusive prosperity
of having owned two earthen pots.
Kalahandi is everywhere:
in the gathering of famished crowds before charity kitchens,
in market places where children are auctioned off, 
in the sigh of young girls sold to brothels,
in the silent processions of helpless people leaving their hearth and home.
Come, look at Kalahandi closer:
In the crocodile tears 
Of false press statements, 
in the exaggerated statistics 
Of computer print-outs,
in the cheap sympathies 
doled out at conferences, 
in the false assurances presented by planners.
Kalahandi is very close to us:
In the occasional contrition of our souls,
in the unexpected nagging of conscience,
in the rare repentance of the inner self.
In the nightmares 
appearing through sound sleep,
in disease,
in hunger,
in helplessness,
in the abject fear
of an impending bloodshed.
How could we then walk
Into celebrated portals 
of the twenty-first century,
leaving Kalahandi behind?

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए

Dushyant Kumar

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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आज मुझसे दूर दुनियाँ

Harivansh Rai Bachchan

भावनाओं से विनिर्मित
कल्पनाओं से सुसज्जित
कर चुकी मेरे हृदय का स्वप्न चकनाचूर दुनियाँ
आज मुझसे दूर दुनियाँ
बात पिछली भूल जाओ
दूसरी नगरी बसाओ
प्रेमियों के प्रति रही है, हाय कितनी क्रूर दुनियाँ
आज मुझसे दूर दुनियाँ
वह समझ मुझको न पाती
और मेरा दिल जलाती
है चिता की राख कर में, माँगती सिंदूर दुनियाँ
आज मुझसे दूर दुनियाँ

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तेरे बिन ये पहला-दिन

Ikram Rajasthani

तेरे बिन ये पहला-दिन,
सूना-सूना निकला दिन।
सूरज किरनें धूप वही,
फिर भी बदला बदला दिन।
तेरे साये, ढूंढ़ रहा है,
कैसा है ये पगला दिन।
तनहाई के सन्नाटों में,
घूमा झुंझला-झुंझला दिन।
शाम तलक तड़पा यादों में,
फिर मुश्किल से सम्भला दिन।

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वीरों का कैसा हो वसंत

Subhadra Kumari Chauhan

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत
भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान;
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का कैसा हो वसंत
गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत
कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का कैसा हो वसंत
हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड;
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का कैसा हो वसंत
भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

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आज एक आकाश नीचे उतर आया

Dr. Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया
करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी,
अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा,
चित्त हुआ सरल, जो था कातर सा,
तन मन हुए भारहीन ,
निज पर की सीमा मिटी,
संकल्प विकल्प सारहीन ,
चेतना की सब धाराएं अंतर को प्रवाहित सी,
कुण्डलिनी ज्यूँ स्वयं की धुरी पर समाहित सी,
प्रेम बना दृष्टि, संवाद भी !
प्रतीक्षा बनी स्वभाव...
आज एक आकाश नीचे उतर आया...

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An Indian Love Song

Sarojini Naidu

HE

Lift up the veils that darken the delicate moon
of thy glory and grace,
Withhold not, O love, from the night
of my longing the joy of thy luminous face,
Give me a spear of the scented keora
guarding thy pinioned curls,
Or a silken thread from the fringes
that trouble the dream of thy glimmering pearls;
Faint grows my soul with thy tresses' perfume
and the song of thy anklets' caprice,
Revive me, I pray, with the magical nectar
that dwells in the flower of thy kiss.

SHE

How shall I yield to the voice of thy pleading,
how shall I grant thy prayer,
Or give thee a rose-red silken tassel,
a scented leaf from my hair?
Or fling in the flame of thy heart's desire the veils that cover my face,
Profane the law of my father's creed for a foe
of my father's race?
Thy kinsmen have broken our sacred altars and slaughtered our sacred kine,
The feud of old faiths and the blood of old battles sever thy people and mine.

HE

What are the sins of my race, Beloved,
what are my people to thee?
And what are thy shrines, and kine and kindred,
what are thy gods to me?
Love recks not of feuds and bitter follies,
of stranger, comrade or kin,
Alike in his ear sound the temple bells
and the cry of the muezzin.
For Love shall cancel the ancient wrong
and conquer the ancient rage,
Redeem with his tears the memoried sorrow
that sullied a bygone age.

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The Love Poem Unwritten

Prof Makarand Paranjape

The poem he wished to write began this way:
Is it come to this
That I am reduced to writing love poems
To you....
There he stopped. A heavy onus
Of unresolved emotions
Seemed to gag him.
He wished to say:
How ironic it was that separation
Had revived their love,
How she still defined his existence
By absence, as she had once done
Through her presence;
How distance generated intimacy,
So that now they were in love again.
And how corny, how odd, how unusual that felt.
Like nothing they'd felt before,
In fact, almost like in the movies,
Their romance was beginning to dramatize itself.
Yes, this was the intoxication
Of not just being in love,
But of being in love with being in love.
He wanted to say: I love you.
I love myself when I love you.
I love what you do to me.
I love what my love does to you.
When I think of us, there's a tremor
Not in my heart, but in the pit of my stomach,
It's a dull fire that spreads upwards,
From my loins. It's a hormonal high
When I remember how we lie side by side,
Naked, and how we make love.
Unlike the past, now we don't even need foreplay.
We are so hot just being next to each other.
And we are so serene when we join,
We even talk and smile.
But as I push into you, in, in, in,
All words are stuck in the throat.
I feel myself dissolving into you,
My self sinking lower and lower,
To vanishing point.
By entering you, I give you back to yourself.
There you are, your face flushed, but calm.
And then there's neither you nor me,
But only a warmth, throbbing and vital,
Which says: Love, love, love,
Or Om, Om, Om--just the primordial note.
We look at each other like this,
And an eternity passes away
As time forgets itself.
He wanted to say:
Now that we're apart once again,
I think, how strange it is to be in love
And to write about one's love,
To write poems to you,
Telling you how much I miss you,
How I am pining away,
And yet how delicious the pain is,
How exciting, inviting, welcome.
To reinvent language to say all this
To call back to oneself the sighs and tremors
Of love, to talk of your eyes and lips,
To celebrate your face, to get lost
In your fragrant tresses, to seek refuge
In the shade of your eyelashes, to praise
The softness and warmth of your touch,
To talk of the scent of your breath,
To remember your intimate gestures,
To cup your breasts in my hands
Like two panting doves,
To nestle my face between them,
And to remember all the noises you make,
And how you clown around, making faces,
And how we invent silly names for each other...
To talk about all this and much more.
In words, words, words, to project myself at you.
Then after this burst of verbal energy, fear:
To think that the person I am in love with
Is not you, but something that I have created myself,
An image of what I love. To think that I have made
An idol of you which in my loneliness I adore.
And how such love fills me with both
Ecstasy and dread, lest you interrupt these effusions,
Breaking through the image, declaring
Your real self, shattering the mirror of dreams.
How all this fits in with the poetry reading
In which I read love poems to you,
Thus becoming a poet in love,
Wooing you with my poems,
Making public our passion,
And in the process, making you my dream, my love, my muse,
Always passive, the recipient of all this homage,
The silent deity to which the priest-poet
Lights his lamps, pouring out his devotion.
And so the recurrent fear:
It's so easy to love one's own creation,
But how difficult to love a real person.
O God, how scared I am of loving you.
He wanted to write all this,
But how awkward and unconvincing it sounded,
And a silent onus seemed to gag him.
He felt saddened at his inability to love.
He thought: being in love is easy,
But to love someone so difficult.
He wondered if he could ever love,
If there was any hope for him,
If his heart heart would melt,
If he would be saved.
How important it was to find love:
It was the perfume of existence;
And life was arid without it.
He examined himself and his own life,
His compulsions to write,
To project things, to become something else,
To alter life, to change reality,
Always the drive, the ceaseless flow of words, words, words.
And now, the onus on his heart,
The inability to write, to express
His stirring love for his own wife,
The inability to force all this into words,
The fear of being found out as a liar,
The anxiety of being exposed and branded,
The dread of discovering his own changeability,
To find out, alas, that he couldn't, didn't,
Was unable to love, to love her.
At last he wrote:
There are those who love;
And there are others who only write poems.
It is you who love;
And I only write poems.
Did he then realize
The simple release of love
And the bitter doom of having to write only poems?

Poem from "The Serene Flame"
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अमृता के ख़त

Amrita Pritam

जीती!
तुम जितनी सब्जी दे के गए थे, वह ख़त्म हो गई है। जितने फल लेकर दे गए थे वह भी ख़त्म हो गए हैं। फिरज खाली पड़ा है... मेरी ज़िंदगी भी खाली होती हुई सी लग रही है - तुम जितनी साँसे छोड़ गए थे, वह खत्म हो रहीं है...

जीती! 
मेरे इस ख़त को लेकर दुःखी मत होना। रात के गहरे अंधेरे में लिखा था। मैं उदास हूं, पर ज़ोरबी हूं, तुम्हारे काम का ख़याल आता है, तो अकेलेपन को बहला लेती हूं। वैसे नहीं मालूम यह उम्र का तकाज़ा है, जिंदगी के बाक़ी रहते थोड़े दिनों का एहसास है...

जीती!
अगर वहां काम का कोई भविष्य दिखाई देता है, तो ज़रूर कोशिश करो, पर व्यर्थ में मत भटकना। यहां घर बैठे हमें सूखी दाल-रोटी भी बहुत है, आज मैं अस्सी बरस की, या किसी पिछले ज़माने की औरत की तरह बातें कर रही हूं — शायद शाश्वत औरत यही होती है)

~ अमृता के ख़त, इमरोज़ के नाम

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अल्पविराम

Manoj Krishnan

जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उसकी बेचैन आँखों को चोरी से देख लूंगा।
जिनसे दुनिया, सहमी हुई, फिरती दिखेगी,
उनमें समा कर, शायद थोड़ी ख़ुशी मिलेगी।
थोड़ा तो ज्ञात है मुझे, उसकी भी मनोदशा,
उसे क्या पता इस आंलिगन का भी है मज़ा।
कब से प्रतीक्षा है मुझे इस अंतिम घङी की,
उसके स्पर्श एवं उसमें विलीन हो जाने की।
रह जाएंगी मेरी यादें और मेरे कुछ अवशेष,
अति सुखद होगा इस एकांकी का पटाक्षेप।
इस तरह मेरी ये कहानी समाप्त हो जायेगी,
पर, अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।
संभवतः आपके लिए ये वदनापूर्ण विषय हो,
हो सकता है थोड़ी असमंजस एवं संशय हो।
परन्तु, इसको मैं परमोक्ष की प्राप्ति मानूंगा,
मृत्यु का वरण कर, जीवन का अर्थ जानूंगा।
जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उन होंठों की कम्पन को, हौले से पढ़ लूंगा।
मृत्यु के चेहरे पर आती ये शिकन बताएंगी,
इक अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।

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After Gujarat

Dr. Jagannath Prasad Das

After Gujarat,
Will there be poetry?
Could poets write
after Alexandria was razed?
Hiroshima and Vietnam;
after the Emergency;
after Babri Masjid,
9/11 and Iraq?
Poetry cannot be banished.
It returns at will
to Plato’s Republic,
to Stalin’s Siberia,
to Pokhran and to Kalahandi,
following in the footprints.
of violence
as it chronicles
the descent of man.
As with history, for poetry
there is no end.
Poetry will be written
despite fatwas and bans.
Poetry will defy the Gulag;
it will ignore the censor’s blue pencil
and the fundamentalist’s frown.
Poetry will be written
even as books
are being burnt.
After Gujarat
Poetry will be written
about Gujarat itself,
beginning with
the shame of Ayodhya
and following the bloody trail
to Godhra, to Gujarat
and on to Mumbai.
When Babri rises
poetry will affirm
that temples are made
not with blood-scribed bricks
or stones carved in hate,
that they, like poetry,
are founded on imagination and faith
in the hearts of men.
After Gujarat
poems will be written
to affirm the truth
that there is no Ayodhya
outside the poet’s
epic imagination.

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अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे

Dr. Omendra Ratnu

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह,
नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्ज़ी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !

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प्रेम

आप और जी की सम्बोधन औपचारिकता से होते हुए
अर्द्धांगिनी और स्वामी तक के हमारे आत्मीय सफर में
मैंने जाना कि,
जीवन की तमाम अनिश्चिताओं और
वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद
प्रेम, तमाम विसंगतियों को पार करते हुए
अंत में सरोवर में खिले कमल की भांति प्रतीत होता है :
मनोरम, मनोरम बस मनोरम।

लेखक परिचय:
उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के निवासी वैभव जी कुमार वैभव नाम से कविताएं लिखते है। वैभव जी ने अंग्रेजी साहित्य से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है, और उन्हें सभी भाषाओं के साहित्य से प्रेम है।
@kumarvaibhav212

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आपसे जब सामना होने लगा

Ikram Rajasthani

आपसे जब सामना होने लगा,
ज़िन्दगी में क्या से क्या होने लगा।
चैन मिलता है तड़पने से हमें,
दर्द ही दिल की दवा होने लगा।
ज़िन्दगी की राह मुश्किल हो गई,
हर क़दम पर हादसा होने लगा।
दोस्तों से दोस्ती की बात पर,
फ़ासला दर फ़ासला होने लगा।
जो ग़जल में शेर बनकर के रहा,
काफ़ियों से वो ज़ुदा होने लगा।
जैसे हो तस्वीर इक दीवार पर,
आदमी अब क्या से क्या होने लगा।
ये तुम्हारी याद है या ज़ख्म है,
दर्द पहले से सिवा होने लगा।

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An Introduction

Kamala Surayya

I don't know politics but I know the names
Of those in power, and can repeat them like
Days of week, or names of months, beginning with Nehru.

I am Indian, very brown, born in Malabar,
I speak three languages, write in two, dream in one.
Don't write in English, they said,
English is not your mother-tongue.
Why not leave me alone,
Critics, friends, visiting cousins, every one of you?
Why not let me speak in any language I like?
The language I speak,
Becomes mine, its distortions, its queernesses
All mine, mine alone.
It is half English, half Indian,
Funny perhaps, but it is honest,
It is as human as I am human, don't you see?
It voices my joys, my longings, my hopes, 
And it is useful to me as cawing
Is to crows or roaring to the lions,
It is human speech, the speech of the mind that is
Here and not there,
A mind that sees and hears and is aware.
Not the deaf, blind speech
Of trees in storm or of monsoon clouds or of rain 
Or the incoherent mutterings of the blazing funeral pyre.

I was child, and later they told me I grew, for I became tall, 
My limbs swelled and one or two places sprouted hair.
When I asked for love, not knowing what else to ask for 
He drew a youth of sixteen into the bedroom and closed the door,
He did not beat me
But my sad woman-body felt so beaten.
The weight of my breasts and womb crushed me.
I shrank Pitifully.
Then… I wore a shirt and my brother's trousers, 
Cut my hair short and ignored
My womanliness.
Dress in sarees, be girl, be wife, they said.
Be embroiderer, be cook,
Be a quarreller with servants.
Fit in. Oh, Belong, 
Cried the categorizers.
Don't sit on walls or peep in through our lace-draped windows.
Be Amy, or be Kamala.
Or, better still, be Madhavikutty.
It is time to choose a name, a role.
Don't play pretending games.
Don't play at schizophrenia or be a nympho.
Don't cry embarrassingly loud when jilted in love...

I met a man, loved him.
Call him not by any name, 
He is every man who wants. a woman, 
Just as I am every woman who seeks love.
In him... the hungry haste of rivers, 
In me... the oceans' tireless waiting.
Who are you, I ask each and everyone,
The answer is, it is I.
Anywhere and, everywhere, I see the one who calls himself I
In this world, he is tightly packed like the sword in its sheath.
It is I who drink lonely drinks at twelve, midnight,
In hotels of strange towns,
It is I who laugh,
It is I who make love
And then, feel shame, 
It is I who lie dying
With a rattle in my throat.
I am sinner, I am saint.
I am the beloved and the betrayed.
I have no joys that are not yours,
No aches which are not yours.
I too call myself I.

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मधुशाला

Harivansh Rai Bachchan

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेहंदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

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मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ

Dushyant Kumar

मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ
एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ
तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ
हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ
एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ
मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ
कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

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पथ की पहचान

Harivansh Rai Bachchan

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले
पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी,
अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।
है अनिश्चित किस जगह पर सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा ख़तम हो जाएगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे
कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।
कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें अपनी उमर, अपने समय में,
और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में,
किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।
स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती,
आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।
यह बुरा है या कि अच्छा, व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ, यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है,
तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

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Kanaka da geet

Amrita Pritam

ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਗੋਡੀਆਂ
ਕਹਿੰਦੇ : "ਲੰਘ ਗਈ ਏ ਰਾਤ
ਕਹਿੰਦੇ : "ਆਈ ਏ ਪ੍ਰਭਾਤ"
ਮੇਰੇ ਅਰਸ਼ਾਂ 'ਤੇ ਸ਼ਾਹੀਆਂ ਅਜੇ ਓਡੀਆਂ ਹੀ ਓਡੀਆਂ ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਗੋਡੀਆਂ !
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਜੰਮੀਆਂ
ਰਾਹੇ ਰਾਹੇ ਜਾਂਦਿਆ
ਓ ਸੁਣਦਿਆ ! ਸੁਣਾਂਦਿਆ !
ਦੁਖਾਂ ਦੀਆਂ ਕਹਾਣੀਆਂ ਨੇ ਦੁਖਾਂ ਤੋਂ ਵੀ ਲੰਮੀਆਂ ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਜੰਮੀਆਂ !
ਕਣਕਾਂ ਉੱਗੀਆਂ
ਖੇਡੇਗੀ ਜਿੱਤ ਮੇਰੀ
ਖੇਡੇਗੀ ਹਾਰ ਮੇਰੀ
ਦੇਈਂ ਦੇਈਂ ਮੀਟੀ ਜਿੱਤੇ ! ਹਾਰਾਂ ਨੇ ਪੁੱਗੀਆਂ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਉਗੀਆਂ !
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਸਾਵੀਆਂ
ਰੋਂਦੇ ਨੇ ਮਾਂਹੀਵਾਲ
ਰੋਂਦੀਆਂ ਨੇ ਸੋਹਣੀਆਂ
ਰੋਂਦੀਆਂ ਝਨਾਵਾਂ ਅਜ ਰੋਂਦੀਆਂ ਨੇ ਰਾਵੀਆਂ ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਸਾਵੀਆਂ !
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਪੀਲੀਆਂ
ਕਾਲੇ ਨਾਗਾਂ ਦੇ ਡੰਗ
ਕਾਲੇ ਹੋ ਗਏ ਨੇ ਰੰਗ
ਪ੍ਰੀਤ ਦੀਆਂ ਨਾੜੀਆਂ ਹੋ ਗਈਆਂ ਨੇ ਨੀਲੀਆਂ ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਪੀਲੀਆਂ !
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਛੰਡੀਆਂ
ਅਸਾਂ ਕੱਠਿਆਂ ਸੀ ਗੋਡੀਆਂ
ਇਕੱਠਿਆਂ ਸੀ ਬੀਜੀਆਂ
ਓਏ ਕਿਨ੍ਹੇ ਆਕੇ ਸਿੱਟਾ ਸਿੱਟਾ ਦਾਣਾ ਦਾਣਾ ਵੰਡੀਆਂ ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਛੰਡੀਆਂ !
ਕਣਕਾਂ ਦੇ ਕੱਖ ਕਾਣ
ਲਹੂ ਲਹੂ ਪੀਤੇ ਅਸਾਂ
ਲਹੂਆਂ ਨੂੰ ਛਾਣ ਛਾਣ ।
ਕਣਕਾਂ ਦਾ ਨਿੱਕ ਸੁੱਕ
ਨਾਲੇ ਅਸਾਂ ਵੰਡ ਲਏ ਨੇ
ਹੰਝੂਆਂ ਦੇ ਬੁੱਕ ਬੁੱਕ ।
ਕਣਕਾਂ ਦੀ ਧੂੜ ਧਾੜ
ਸਾਡੀ ਦੇਸ਼ ਭਗਤੀ ਦੇ
ਕਾਰਨਾਮੇ ਮਾਰ ਧਾੜ ।
ਕਣਕਾਂ ਦੇ ਰੋੜ ਰਾੜ
"ਰਾਖ਼-ਰਾਖ਼" ਖੇਡੀ ਅਸਾਂ
ਮਹਿਲਾਂ ਨੂੰ ਸਾੜ ਸਾੜ ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਸਿੱਲ੍ਹੀਆਂ
ਲੋਕ-ਪੀੜਾਂ ਤੇ ਰੋਣ
ਕਦੇ ਬਣਦੇ ਨਾ ਗੌਣ
ਅਜੇ ਮੇਰੇ ਦੇਸ ਦੀਆਂ ਅੱਖੀਆਂ ਨੇ ਗਿੱਲੀਆਂ।
ਹੋ ਕਣਕਾਂ ਸਿੱਲ੍ਹੀਆਂ !

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Awaited Letter

Prof Makarand Paranjape

The Awaited Letter
is always penned at night,
not necessarily in stealth
but in a site or manner more
cherished and rare--privacy.
Much of it comes in single
cloud-bursts of ardour or
empathy; much more than ink
flows when it is written.
Then, only words on the page
remain and the pleasure of
being spent. What actually
was written is forgotten.
Once finished, the writer is
anxious to dispatch it as if
its portents must reach their
favoured destination at once.
The eyes that read it over
and the hands that seal
the cover are wont to be a
trifle restless, impatient;
sometimes the stamp can be
askew, the flap soaked
in glue, or there's a minor
error in the address.
The act of actually posting it
is never innocent; prominent
post offices are preferred
for the security they induce.
But once in, it's out of her
hands; a certain feeling of
freedom follows but also a
familiar fear: will it reach?
All night the letter lies awake
quietly, waiting, almost smugly
because it knows how unlike
it is to its pedestrian peers.
The envelope is picked up, marked,
sorted, flung, trussed up, tossed
hither and thither, handled by
so many during its long journey,
creased, sometimes stained with
greasy fingers, or damp and
smudged in the rain. But inside,
the letter itself is intact,
a virgin, unseen and untouched
by any, snugly smiling in anti-
cipation of yielding itself
only to her rightful owner.
The latter already knows it
is on its way as if the sender
had kissed him in a dream
to inform him of its coming.
Yet a feline unease shadows him
as he awaits to repossess that
which he surrendered so suddenly
in a fond or foolish overture.
Waiting, even for what he
knows will arrive, is so hum-
bling; whom can he blame if a
promised missive miscarries?
While he cannot admit the eager-
ness of his need, it has already
reached his post office to be
dropped into his box tomorrow--
or else, it glows distressed,
like a radioactive particle,
in some godforsaken graveyard
of undelivered messages.
Having once reached, look how
teasing it can be, lurking
inconspicuously between all
sorts of junk-mail, only to
spring into his hands suddenly,
dazing him with surprised
joy, and making him shy with
pride, like a woman pleased.
Perhaps, the sender well knows
that both her hands and eyes
have left invisible traces that
rekindle themselves on contact:
some letters, like poems, must
not only be read, but smelt,
stroked, held, and even carried
like shy brides, to bed.
But life is not literature;
an awaited letter is habitually
never written; if written
it is often never posted
but recessed into that inner
wilderness which is awaste
with so many unlived or erased
wishes and sickened dreams.
Even when it is signed, posted,
and received, its comforts
eventually abate: found,
the lost beloved is revealed
as the image of one's own
self. Correspondents who
are experienced know that
somewhere the longed-for one
awaits every seeker; we watch
helpless as a strange magnetism
draws us together even over
the chasms of several shipwrecked
births: how the received letter
works its magic fusing him into
into her! Now the reply he must
write becomes the awaited letter.

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स्थगन

Kailash Manhar

इतनी सारी दुविधायें हैं जीवन में कि
सुविधा के लिये स्थान ही नहीं है कहीं
मरते हुये बच्चे पर नज़र गड़ाये बैठे गिध्द हैं
और कहीं एक हरिणी है
अपने छौने को बचाने के लिये
सुपुर्द करती बाघ के जबड़ों में अपनी देह
आह!
अख़लाक की चीखें गूँज रही हैं कानों में
और उस स्त्री का चेहरा जो
कड़ा कर के अपना मन कूद रही है
अथाह गहरे कूँए में
बिलख रहा है पाट पर बैठा दुधमुँहा बच्चा
और सरकार के लिये जरूरी है
शहरों का नाम बदलना
बचाओ!बचाओ!की चीत्कारें गूँज रही हैं
हर दिशा में बदहवास
दौड़ते लोग दिखाई देते हैं
सुनो!
कुछ दिन के लिये स्थगित रखो प्रेम
अभी ज़हर बहुत है हवाओं में

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आज उस पक्षी को फिर देखा

Kedarnath Singh

आज उस पक्षी को फिर देखा
जिसे पिछले साल देखा था
लगभग इन्हीं दिनों
इसी शहर में
क्या नाम है उसका
खंजन
टिटिहिरी
नीलकंठ
मुझे कुछ भी याद नहीं
मैं कितनी आसानी से भूलता जा रहा हूँ
पक्षियों के नाम
मुझे सोचकर डर लगा
आख़िर क्या नाम है उसका
मैं खड़ा-खड़ा सोचता रहा
और सिर खुजलाता रहा
और यह मेरे शहर में
एक छोटे-से पक्षी के लौट आने का विस्फोट था
जो भरी सड़क पर
मुझे देर तक हिलाता रहा।

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हजारों ख्वाहिशें ऐसी

Ghalib

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले
डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले
निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले
भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले
मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले
हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले
हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले
मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले
जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले
खुदा के वास्ते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले
कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले

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नया साल

Amrita Pritam

जैसे सोच की कंघी में से
एक दंदा टूट गया
जैसे समझ के कुर्ते का
एक चीथड़ा उड़ गया
जैसे आस्था की आँखों में
एक तिनका चुभ गया
नींद ने जैसे अपने हाथों में
सपने का जलता कोयला पकड़ लिया
नया साल कुछ ऐसे आया...
जैसे दिल के फिकरे से
एक अक्षर बुझ गया
जैसे विश्वास के कागज पर
सियाही गिर गयी
जैसे समय के होंठों से
एक गहरी साँस निकल गयी
और आदमजात की आँखों में
जैसे एक आँसू भर आया
नया साल कुछ ऐसे आया...
जैसे इश्क की जबान पर
एक छाला उठ आया
सभ्यता की बाँहों में से
एक चूड़ी टूट गयी
इतिहास की अँगूठी में से
एक नीलम गिर गया
और जैसे धरती ने आसमान का
एक बड़ा उदास-सा खत पढ़ा
नया साल कुछ ऐसे आया...

This is one of the rare examples in literature ushering in a new year with a resolute melancholy, written by Amrita Pritam, a prominent Punjabi poet.

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जब भी कभी तेरा नाम लिखा

Ravinder Kandari

ज़िम्मेदारियों भरा कभी कुछ लिखा नही मैंने,
पर जब भी कभी तेरा नाम लिखा,
कोरे कागज़ पर,
साँसे रोक इत्मीनान से,
क़लम चलाई है मैंने !

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Nightbreak

Taseer Gujral

Its been a week
of falling apart
though the night makes me believe
we are fine
so i pull over the curb
click the key into the lock
step into the shower
meanwhile
bullets keep flying over
a war ravaged world
gulping a draft of water
i hold my breath lying next to you
all is fine, we believe as we make love
In the foreground of a 70s number
meanwhile
bullets keep flying over
a war ravaged world
In the cusp of a rising fall
we forget that we are not meant
for each other
even if for a brief while
night is the light that stops us
from falling apart
like frayed, dead leaves.

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यह कदंब का पेड़

Subhadra Kumari Chauhan

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे             
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली
 तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता
बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता
तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे

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Mind

Dr. Gaurav Mathur

Mind,
Stop this chatter
Stop this search
What you are looking for
Is right here
But you cannot see
And you cannot hear
In your silence it manifests
Loud and clear
Ending of the ego
Is the end of fear

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Paying respects to Shri Atal Bihari Vajpayee

Atal Bihari Vajpayee

On the occasion of the sad demise of our three-time former Prime Minister, Shri Atal Bihari Vajpayee, The Kaavya Circle sends warmest condolences to his family and friends. His work has inspired millions. We thank him for his crucial contribution to the country.

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महाशून्य के साथ

Dr. Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री! कन्या, भोली, कुंवारी!
हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़!
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई,
अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़!
रूप, गंध, स्पर्श, शब्द से विरस होकर, अरूप, निशब्द, अस्पर्शित, निर्धूम से नाता जोड़!
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ?
अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़!
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती,
प्रेम और करुणा के संग साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी !

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तू अब भी है

Dr. Omendra Ratnu

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें,
वजूद में मेरे घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तन्हाईयों में मगर , तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से अब फ़र्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनून में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है

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मन के मयूरा

Dr. Omendra Ratnu

नाच ओ मन के मयूरा नाच !
चेतना के ज्वार पे चढ़ ,
महालय के स्वाद को चख ,
निस्तब्धता के घुंघरुओं को जांच ,
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
काल वर्णी मेघ छाए,
मित्रता के हाथ आए ,
साँच को आती नहीं है आँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
माया पाश क्षीण पड़े ,
सुर नए विस्तीर्ण गढ़े,
कर्म विगत लेखनी को बाँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !

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तृप्त

Dr. Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में, निश्चिंत!
क्या करूं अतिक्रमण, ठिठक के रह जाऊं,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,…
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं!

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आप बार बार आए

Dr. Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आए...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आए,
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए!

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मौन का साम्राज्य

Dr. Omendra Ratnu

मैंने देखा मौन का साम्राज्य,
वाणी के जगत के समानांतर,
धारण किये उसे भी,
किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य, अप्रभावित,
स्थापित एक वर्तुल में, स्वयं में लीन
विस्तीर्ण और अविभाज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ,
वाणी के भरता घाव स्थायित्व से ,
गर्भवती स्त्री सा,
स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे ,
पूरी सहिष्णुता से,
बिन राजा, बिन प्रजा, ये कैसा राज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ...
भासता निष्ठुर, किन्तु है करुणामय ,
बैठा अनमना सा,
ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही ,
निश्चिन्त उपवास में रत ,
देता प्रवेश निस्पंद, विदा भी, बिन क्रंदन ,
परम अद्वैत में स्थित,
न कुछ ग्राह्य, न त्याज्य!
मैंने देखा मौन का साम्राज्य

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भरपूर मनुष्य की तरह

Kailash Manhar

ख़ुद से बना रहे मेरा लगाव
स्वाभिमान के साथ
जन से बना रहे जुड़ाव
ईमानदारी से और
बना रहे सच्चाई का भाव
पारदर्शियतायुक्त मन में
बनी रहे हिम्मत
अन्याय के विरुद्ध बोलने की
शोषण की पोल खोलने की
न्याय के पक्ष में रहने की
झूठ को तनिक भी नहीं सहने की
आदत बनी रहे शब्द पर विश्वास की
सार्थकतापूर्ण आस की
फिर क्या फर्क़ पड़ता है कि तुम
कवि मानो या न मानो मुझे
अथवा बना रहूँ या नहीं मैं स्वयं भी
क्या इतना-सा ही काफ़ी नहीं
कविता के लिये
कि जिसे कवि कहा जाये वह
एक भरपूर मनुष्य की तरह जिये

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चिन्ता-सी सुलगती है

Kailash Manhar

तापने के दिन अभी नहीं आये लेकिन
जलावन तो करनी है इकठ्ठी
कार्तिक की इस चिरपरी शरद में
आने वाली शीत लहर का अंदेशा तो है
हाड़ों को कांपने से बचाना तो है कि
गुड़ खरीद लिया जाये दसेक किलो और
लालड़ी गोंद टाबरों के लिये
घी का हो जाये इन्तज़ाम तो बहुत अच्छा
वर्ना तिल्ली का तैल तो हो पांचेक सेर
बाजरे की भी खरीदनी तो है एक बोरी क्योंकि
राशन का गेंहू तो पूरा नहीं पड़ता वैसे ही
त्यौहार पे त्यौहार और पड़ने हैं इन्हीं दिनों
दुनिया भर में होगी चकाचौंध
पाँच दीये तो हम भी जलायेंगे चौखट पर
मजूरी मिलती रहे लगातार राम करे
पलते रहें बाल-बच्चे निरापद
तापने के दिन हालांकि अभी नहीं आये
चिन्ता-सी सुलगती है मन में बिन सुलगाये

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यह समय

Kailash Manhar

यह सोचने का समय है
सोच सोच कर परेशान होने का समय है
सोचते हुये ऊबने का समय है
ऊबते हुये डूबने का समय है यह
किन्तु फर्क़ भी क्या पड़ता है इसमें कि
डूब रहा है जब सारा देश
जब सारा समाज डूब रहा है ऊबते हुये
सोचते हुये और परेशान होते हुये
जब कविता से बच रहा है प्रत्येक व्यक्ति
यह कविता रचने का समय है
कविता पढ़ने का समय है यह
कविता को गुनने का समय है

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शरद: कुछ काव्य-चित्र

Kailash Manhar

(एक)
कास के रेशमी फूलों को सहला रहा है
किशोर वय का सुकोमल हाथ
गूलर के पके हुये फलों को देख रही हैं
उफनते यौवन की रतनारी आँखें
(दो)
झील की सतह पर खिली है शुभ्र ज्योत्सना
तल में से झांक रहा है पूर्ण चन्द्र
तुम भी होते यदि साथ
यह रात हमारे लिये अविस्मरणीय होती प्रेम!
(तीन)
पीपल की डाल पर प्रेम मग्न पक्षी-युगल
हवायें सिहरा रहीं हैं तन-बदन
मन में कोई हूक-सी उठती है
बांध कर रख लूँ तुम्हें चाँदनी की डोर से
(चार)
केसर में नहाई है देह
कैर के फूलों का रंग लेपा है अधरों पर
कांटों में उलझा है आँचल
छुड़वा कर ले चलो साथ कहीं दूर मुझे
भोर का उजास होने के पहले ही
(पाँच)
शरद की चाँदनी में सीझ रही है
अँगीठी की धीमी आँच पर
गाय के दूध की सुमधुर खीर
बल बुध्दि वीर्य वर्धक
तुलसी-दल डाल दो तुम अपने हाथों से
(छह)
मोगरा महकता है सांसों में
हवायें बह रही हैं मलय-गंधी
स्वप्न-स्वप्न झरती है उत्कंठा
शरद में होना था दोनों को साथ-साथ
(सात)
कार्तिक-स्नान से लौट रही हैं स्त्रियाँ
मंदिर में गूंजने लगे आरती के स्वर
शरद के रंग में रंगा है ईश्वर भी
हरि यश में गाती है मिलन-गीत विरहिनी

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The Silence of the Self

Dr. Gaurav Mathur

Unask the question
Who am I
Self inquiry is not a process
It is also not the goal
There is no self to inquire
No self to inquire about
There is no inner silence
Silence alone is the truth
Realms inner and outer
Are but castles in air
Silence is our nature
That the play of forces
Seems to disturb
Like an enormous tsunami
Raging fifty feet high
Over Mariana Trench
And every drop of water
In the crashing wave
Has the still of the ocean depth
And the silence of the Self

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Kartavyam

Dr. Gaurav Mathur

Karma is also a lie
Presumptuous to assume
That action is needed
To set the world right
Another devious ego-game
Another self-inflicted
Twist of the knife
Another subtle but sure
Hiding place of the mind
And I wake up to look out
From the window of my miniscule mind
A portion of the morning sky
This is the only truth
The only thing to be done
Look without words or imagination
At the fiery morning sun
Castles in the air
Magnificent and beautiful
In which we frolic
You and I
Wake up to see
It was all a dream
You were not there
Nor was I
Just figments of imagination
Of the devious mind
So when they are razed
Why do I feel homeless
Why do I cry
Self pity and blame
Hurt and claim
Movements of the vital
That take us for another ride
Down the same rabbit-hole
Of make-believe and lies
Let’s wake up together
Side by side
On this hard earth bed
And see each other anew
Nay, for the first time

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The Inner Silence

Dr. Gaurav Mathur

The inner silence
Is a fickle Overlord
Creator of all things
Yet so shy and retiring
So soft and still
Yet gentle and caring
That all motion,
Circumperambulation
Seems crude, uncouth
Almost an effront
Indeed, truly, a mockery
Of the infinite grace
That bestows me limbs and vigor
And I, oh so gross so ingrate
Cannot abide in this vast stillness
That suffuses and invades all
Carries and pervades all
For any longer than a mere breath
Which too, it breathes in me
Even this brick wall
That I sit facing
Has more respect in its erect repose
Than I in myriad genuflections
So I sit with bowed head
A grotesque monstrosity
A shameful caricature
Of that perfect perfection
That manifests through me
Arjuna,
Lift thy mighty gandeev
And shower your arrows upon me
Destroy all that is vain and dross and ugly
Pierce these eyes
That seek form outside
Destroy sight forever, return it inside
Yudhisthira,
Blow thy conch anantavijaya
Implode my eardrums
That reverberate to the cantankerous world
Let the inner silence be all,
Let it deafen the world outside
Eklavya,
Sew my lips shut
That no word escapes
Corrupting my innermost truth
In the silent cave of the heart
Expressed, no longer the Absolute Truth
Bheem,
Lift your mighty vrigodharan
Flatten this intellect with thy incessant blows
Rip apart the ego like you did Jarasandha
That only the ineffable self remains
Krishna,
I am now ready
Reveal thy divine beauty

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The Universe and I

Dr. Gaurav Mathur

I sit silent in my chair
Poised with pen and paper
All eyes and ears
Waiting to catch a glimmer
Or the faintest whisper
Of the Eternal
Nothing
And all around me
Chirping birds, flowing water
Rustling leaves, drizzling rain
Distract and divert
Dissuade and derail me
And I achieve, or so it seems
Nothing
Life, the universe
Everything
A grand conspiracy
Overrules my negation
Overwhelms my senses
I am drowned
In a deluge of Being
My peace and quiet
My inner solitude
My silent core
All are hushed by the roaring tumult
Of Life, the universe
Everything
Even the solitary flame within
Quenched by the fiery glow
Of a thousand splendid suns
Blazing forth forever
Life, the universe
Everything
Have consumed me completely
Nowhere to run, nowhere to hide
There is no outer world
There is no me inside
Only sitting and flowing
Silence and chirping
Paper and leaves
Drizzling and blazing
Nothing and everything
Life, the universe and I are One.

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Deliverance

Dr. Gaurav Mathur

Deliverance through surrender
Order re-restored
My true self is now in form
Whole, wholesome, pure
Unchanged, or rather back to the original form
Self before me, before time
Unchained, or rather the simple realization
That there were no chains
Except of my design
No inner or outer
And certainly no I in the center
Back to the source, mother lode
My self, struggle, pleasure and pain
Fire and brimstone
Extinguished in a deluge of tears
Strangely salt has made the Self-sweeter

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One Cosmic Dance

Dr. Gaurav Mathur

Thought and its futility
Are seen
Desire and its pointlessness
Are seen
Fear and its subsidence
Are seen
The unwavering flame of attention
Engulfs all that is
Mind is still, void of content
Ego sinks back in quiet repose
To its source
All is as is
Naturally at ease
And the Self is all there is
A presence within and all around
The benevolent monarch
Calm and eternal
Patient and gentle
Soft and subtle
All-pervading, yet untouched
Creator, mover and destroyer
Of worlds upon worlds
Which are all but itself
Playing with itself
The raas of Krishna
And Shiva’s tandav
Are one cosmic dance
Of the unmoving Self

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I am not

Dr. Gaurav Mathur

Victim or victor
I am not
Friend or lover
I am not
Poet or philosopher
I am not
Seeker or seer
I am not
Thought or thinker
I am not
Experiencer or doer
I am not
Do not ask who I am
For I am not
I am not

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Casually

Dr. Pariksith Singh

Casually
Without importance
Into this world arrive
Without splitting
Or choosing
As if the breeze should steal
Into the garden without a flutter
Of leaves
Arrive unannounced and leave
Just as soon
Without a ruffle
As a wave should rise in a still pool
And melt in the quietude
Ever so lightly
Depart even
As you arrive

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Radha's Geet: At The Golden Shore

Dr. Pariksith Singh

At the golden shore
Alone
I have lost all meaning
Anonymous
Among nameless things
Why does the lone star
Make me transparent?
The antariksha is both
Without and within
Where empty of thought
Awareness is timeless
Objects rise and fall
Residue of feeling
Collapse without name
All that remains
Is dark space
That I am

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Sky Bird

Dr. Pariksith Singh

To fly
Is to be
The infinite space
To rise
Into openness
The vast opens as I
My love of transparence
Fills me now
To flesh and marrow
The journey upon my breast
Enters each cell
As the journey within
Each horizon
My new home
Where stillness is flight
And skin porous as space
The seeking of flesh
To be light
A bird of thought
Behind each background
Secretly preening
The gyre of each dream
Ascending higher
To the Great Bird
Can each bird
Winging through my pen
Escape the tyranny of word?
The expanse of flight
Caught within
A secret winging
And space too
Is turned into
The thought of a bird

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Twilight

Dr. Pariksith Singh

Slowly we drift into shadows
As twilight grows dun
Selves of gray
Disappear in the dark
Our bodies buried
Under their own
Subliminal weight
Slide into the murk
In the pure abyss of night
With closed eyes
Shorn of thought
Each object is seen
In entirety
A little lamp still
Burns unseen
Within the quiet
Center of things

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In Love (At Thirty)

Prof Makarand Paranjape

To make even one single person happy,
To love her completely, to give her without restraint
All that you could if your were God himself;
Or to love, even a plant, an animal,
Any piece of life; to nurture it,
To care, to have tenderness for someone else;
Even to do this just once, fully and entirely,
Is to fulfill one's life and find heaven afterwards.

Poem from "The Serene Flame"
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College Days

Prof Makarand Paranjape

In the grilled window overhead
Before ringing the bell
I see your face.
It is only love, nothing else.
You rush down the stairs
You hold my hand,
Your cheeks flushed with excitement.
It is only love, nothing else.
We sit on the lawn
In cushioned wicker chairs.
The night queen exudes its scent.
It is only love, nothing else.
You smile at me,
I lean over,
The world blurs out of focus again.
It is only love, nothing else.
At the sound of the car
We hastily disengage,
You rearrange your hair.
It is only love, nothing else.
* * *
Then, your parents suspect.
They inspect your mail,
They take counter measures.
It is only love, nothing else.
We meet elsewhere
Whispering in dingy cafes,
Under the waiter's suspicious gaze.
It is only love, nothing else.
Or else outside your college,
Or on a park bench,
Or in a shopping centre on a weekend.
It is only love, nothing else.
On your birthday, before the final exam,
You lie you're at a friend's place,
We meet in an expensive restaurant.
It is only love, nothing else.
In the dim light you say
We can't go on like this.
In silence I stare ahead.
It is only love, nothing else.
* * *
At last it is time to graduate.
You hold my last letter,
Now smudged, tightly to your chest.
It is only love, nothing else.
What will become of me, you wail,
My throat catches too,
The sari slips off your heaving breasts.
It is only love, nothing else.
In a flash, all the memories--
Letters, phone calls, innumerable meetings--
Dart by as we watch, helpless.
It is only love, nothing else.
You resist my caress, at first
But suddenly yield, with vehemence.
It is to be our last embrace.
It is only love, nothing else.
I leave town.
You settle down,
Marrying somebody else.
It is only love, nothing else.

Poem from "The Serene Flame"
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Getting Outside Patriarchy

Prof Makarand Paranjape

Our distances are intimate,
We grow vast in our silences.
In freedom we have blossomed,
Not having thwarted one another.
How unrestricted are our movements:
We have never tried to trim each other to size.
You come back, asynchronious,
Twisted by your concourse with others.
I react to your divergences.
How we have fought,
With no holds barred
Tearing at each other fiercely,
Until our brains nearly exploded.
Then, all anger spent,
Not one word or hit, left unstruck,
We gaze at each other mutely--
Astonished at the devastation
Each has wrought on the other.
Standing forlorn amidst the debris of our selves,
We heal, and once again
Stretch towards each other,
All our crooked places straightened.
We are the enemies of each other's egos
Ruthless in hunt;
Thus we destroy and recreate each other ceaselessly.
Yet our eyes talk and understand
The subtle signals of love,
The open smile of happiness
Wrapping the other in a warm embrace.
Indeed, our gestures are complete.
My curses have failed.
The blows that I struck you
Drained me of all violence.
Even memories have lost their sting.
Instead, eternal be my blessing
Overflowing all the harsh sayings,
Washing them away like loose dirt.
So go, you are not mine--
Prosper and flower wherever you are.
And yet stay,
Grow strong and straight
Like a companion eucalyptus,
Tall and elegant,
And restless in the breeze.

Poem from "The Serene Flame"
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Apostrophe to Poverty

Prof Makarand Paranjape

Poverty is not so easy to attain.
It is not all misery--belly-pinching brats,
motherless, naked and dirty, let loose
among garbage heaps on squalid streets;
it is not always a toothless importunate hag,
shrunken and gaunt, who, accosting you on the footpath,
clings and clings, pleading she has no other refuge;
it is not always the slum in Calcutta or Bombay
where during the monsoon, the pus of the city
oozes, and women, with babies at their breasts
wade across filthy gutters by the roadside
to reach their dissolute hovels; it is not always
some leper on display, limbs arranged on a cart,
a wrinkled begging bowl of tin balanced between
stubs of arms, pushed by his bandaged companion.
We, for whom poverty is the only sin,
miss the true meaning of what it is to be poor.
Regard myself in my own comfortable cage
twenty concrete floors above the common street
surrounded by my solacing clutter of machines:
my washers, dryers, heaters, coolers, mixers,
air-conditioners, refrigerators, cookers, grinders,
dish washers, vacuum cleaners, hi-fi stereos, CD-Roms--
wonderful possessions, too numerous to mention--
fabricate my secure and happy delusions. My day
which ended with a sedative, begins with the alarm
of a chronometer made in Japan. Wired to a shaver,
I adjust temperatures, turn on the coffee maker,
automatically dispose garbage, receive recorded messages
from the office, blip the tube for the Morning News,
open refrigerator, collect dishes from the washer,
breakfast instantly, and if not constipated, defecate,
shower, shampoo, condition, blow-dry hair, dress,
descend in the elevator to my automobile, waiting
in the bowels of the building. After I leave,
the fluffy carpet smothers the floor, bolted windows
preserve the air-conditioning; pets, and potted plants
on display, strategically placed for effect, languish
for want of sunshine and air.
Regard myself among
all these, my indispensable possessions. Can I
one muffled night, walk away from all this that ties me?
can I, oppressed by my fears and uncertainties,
disappear into the night to find all the answers?
"I shall not rest until I have found the truth"--
can I take such a vow and simply leave in the dark
without even a note, as over two thousand years ago
Gautama did? With all my engagements, can I
without notice, even take a vacation? No, impossible.
I will be registered with the Missing Persons Bureau.
The media will blare my absence; the major newspapers
announcing a reward for my capture, will print my
picture; my wife will hire detectives to track me down,
and if I am found, she will probably file for divorce,
suing me for desertion and maltreatment. Afterwards,
endless alimony payments will follow as a matter of course.
No, my friend, even if I want to, I cannot be poor.
Poverty, the plain fact is, cannot be inherited;
it has to be acquired, for it is a quality of the mind.
Poverty is the lack of need, not the want of possessions.
It cannot be forced, because it is voluntary.
He who knows what it is to be poor, always walks
upright; using only what he needs, refusing all excesses,
he is the essential man, without any superfluity.
Or, consider another angle:
we humans are beings of spirit and flesh.
some stuff the spirit, starve the flesh,
some starve the spirit and stuff the flesh.
Some die of too little, some die of too much,
and all those who die are equal. Hence,
privation and repletion are variations
of the same illness. So don't think that
being rich, in itself, is better than being poor,
for in the ultimate analysis, despite your wealth,
can you deny, that in truth you own only yourself?
Beyond a certain point,
I do not care to prolong this argument.
These words formed in indignation
always dissolve in a calm beyond comment.
My philosophy is simple
though some consider it partisan and limited:
the poor define their opposites;
without them none would be rich.
Hence, if nothing else,
let me here declare
my allegiance to my deprived countrymen,
however unlike them I may be.
Let poverty be my lot,
let me make this meagre offering
at the shrine of indigence.
Having now come out into the open,
taken sides for the rest of my days,
let me end,
on a note of uncharacteristic bluntness:
we mustn’t extend our judgements
to what we do not comprehend;
we should accept each other,
as we are—rich or poor--
or mind our own business, please.

Excerpts from "The Used Book"
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Mermaid

Prof Makarand Paranjape

I dreamed of bumping into you suddenly,
say, at Teen Murti house,
or at the Times of India building,
and imagined what I'd do then:
give you a big hug and a kiss,
unable to restrain my happiness
on seeing you after twelve years?
Your long, straight, glossy hair
would have done a shampoo commercial proud.
The hooked nose
only added character.
You had a grandmother's benign smile,
but such petulant eyes.
Though terribly insecure,
you always seemed so sure of yourself.
I still remember some of your famous lines:
“Are you asking me out on a date?
Then say so, don’t say ‘Do you see movies?’”
“Incidentally, I don’t go out on dates.”
"I know I'm attractive, though not beautiful...”
“Just because I'm liberated doesn't mean I'm available...”
All your admirers had them by heart—
we rehearsed them and laughed.
At last, you held my hand on the abandoned stairway
leading to the roof of your college.
Before I could begin to appreciate the sensation
we were surprised by a puritanical lecturer
on the prowl, who threatened to report us.
You told him off with characteristic confidence:
"We know what we are doing,
we don't need you to guard our morals."
The poor man was too taken aback to answer.
Yes, the Hauz Khas poem actually
belongs to you, though it occurs in her book.
Remember how we visited the village
before any of the boutiques had come up.
There were reams upon reams of dyed cloth,
in myriad bright colours,
stretched to dry in the sun,
like swathes of a rainbow, descended on earth.
We also visited Mulk Raj Anand's famous house,
but found that he was in Bombay.
Then to Feroze Shah's tomb and madarsa
which was our favourite haunt.
How proud you were when I took a taxi
from the University all the way to your place
just to wish you happy birthday.
I picked up the flowers at C.P.
and called to ask if I could visit at 6:00 p.m.
You told your dad, "You can set your watch
by him. It has to be six o'clock now"
as I was announced and introduced.
You were the happiest that day.
How intensely as we talked, dreaming
of great things: “We’ll change the world,”
you boasted: “you'll be like Sartre,
and I, Simone de Beauvoir."
Of course, I proposed to you.
Then why did you not accept me?
"I’m not sure I love you--" you often said,
"don’t you know how badly Sartre treated de Beauvoir…?"
You went off to the U.S. with someone else
but that broke up too, I heard.
Finally, it was clear
that you'd never really be able
to let go of yourself. You were too
scared of losing control, of heartbreak,
of needing somebody else.
I once wrote to you
just after I'd married her
that I loved you and only you.
I showed her the letter and hurt all three of us.
But time passes and with it
what once was so precious
is hardly worth preserving now:
“I’m just an aging spinster,”
you say when we meet,
“do you still want to be my friend?”
You’re tone is light and ironic,
but why is there a wistful look in your eyes?

Excerpts from "Partial Disclosure"
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Free Fall

Prof Makarand Paranjape

Let me forget myself momentarily
as the divine did itself when it made this
beautiful world of sound, light, and colour,
and peopled it with all kinds of creatures,
great and small, peaceful or violent.
So let me find myself completely in the object
of my desire, let my self be totally lost
in the other, let me thus become a woman,
and fall hopelessly in love with the man
in her. Let this love have no destination,
no hope of fulfilment or consummation;
let it be entirely futile, pointless, even
inconsequential. And let my heart be riven,
broken, crushed, scattered beyond all
retrieval or recognition, let all my poise
and self-control, my pride of manhood
be totally undone in this all-consuming
passion. O victory, I shall seek you
in my utter ruination, like a desperate
soul seeking solace in everlasting annihilation.
My obsession brooks no restraint or moderation;
I must be totally destroyed before I'm done,
no particle of me left safe or untouched.
I risk all to gain all; I am reckless in love
because I know that the one I love, after all,
is not I or you, but the lost whole of which
both are parts. I am willing to wager all
because I know that my love will be as safe
with you as it is with the Mother of God.

 

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The Original

Prof Makarand Paranjape

She no longer poses but is just herself,
this woman, who is an artist's model.
Undressing for a living, she's stripped
daily of much more than her clothes.
Now there she sits totally defenceless,
not even comfortable in the straight backed chair,
but twisted, drooping, cold, and naked--
her sagging breasts, thin and sad,
and her subdued sex, timidly peeping
from between her thighs,
like a small, quiet mouse.
Her fleshy lips and empty eyes tell one story;
the artist's brush, paints and easel, tell another.

 

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कैसी होगी तेरी रात परदेस में

Ikram Rajasthani

कैसी होगी तेरी रात परदेस में,
चाँद पूछेगा हालात परदेस में।
ख्व़ाब बनकर निगाहों में आ जाएँगे,
हम करेंगे, मुलाकाल परदेस में।
बादलों से कहेंगे कि कर दे वहाँ,
आँसुओं की ये बरसात परदेस में।
रंग चेहरे पे लब पे हँसी दिल को चैन,
कौन देगा ये सौग़ात परदेस में।
तुमको महसूस होती नहीं जो यहाँ,
याद आएगी वो बात परदेस में।
हर क़दम पे नज़र तुमको आएँगे हम,
देखना ये करामात परदेस में।
ज़ेहन की वादियों में सजालो इन्हें,
काम आएँगे जज्ब़ात परदेस में।

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मोतियों की तरह

Ikram Rajasthani

मोतियों की तरह चेहरा तेरा सच्चा लगता,
हमको दुनिया में कोई और न अच्छा लगता।
तेरे माथे पे जो बिंदिया है, सलामत रखना,
ये अँधेरों में कोई चाँद चमकता लगता।
किस तरह आँख मिलायें, कभी ये तो बतला,
तेरी पलकों पे सदा शर्म का पहरा लगता।
मैंने माँगा था इबादत में, इन्हीं लमहों को,
साथ में तेरे मुझे वक्त भी ठहरा लगता।

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सुकून

Ikram Rajasthani

ढूंढ़ता है आदमी, सदियों से दुनिया, में सुकून।
धूप में साया मिले, कमल जाये सहरा में सुकून।
छटपटाती है किनारों, पर मिलन की आस में
हर लहर पा जाती है, जाकर के दरिया में सुकून।
बेक़रारी है कभी, पूरे समन्दर की तरह,
और कभी मिल जाता है बस, एक क़तरे में सुकून।
ज़िन्दगी को इससे ज्य़ादा और क्या कुछ चाहिए?
लबस हो इक प्यार का, और उसके लमहात में सुकून।
हर सवाली चेहरे पे लिख़ी इबारत देखिए,
चैन है कि न आँखों में, और कौन से दिल में सुकून।
वो खुदा से कम नहीं लगता है, मुझको दोस्तो,
मेरे ख़ातिर माँगता है जो दुआओं में सुकून।
ये उसी दामन की भीनी खुशबू का एहसास है,
जो मुझे महसूस होता है हवाओं में सुकून।

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Zakhm phir se khula

Dr. Pariksith Singh

ज़ख्म फिर से खुला तो हुआ आईना
लहू की जगह बस एक शुआ आईना
तेरा ही अक्स झलकता था नज़रों में
दिल से उठती बस एक दुआ आईना

A wound opened again and became the mirror
In place of blood, a ray of light the mirror
Your reflection alone shimmered in my eyes
Only a prayer arising from my heart the mirror

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Ye Nayaa Andaaz Hai Aapkaa

Dr. Pariksith Singh

ये नया अंदाज़ है आपका
ख़ामोश हर अलफ़ाज़ है आपका
मिलते हो जब हट जाऊं मैं तुम
फ़ाश भी हो राज़ है आपका
This is your new style
Each word of you has fallen still
You meet me when I disappear
Even exposed you are under a veil

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Waqt Guzar Gayaa

Dr. Pariksith Singh

वक़्त गुज़र गया मेरे दोस्त मगर शाम वही है
पीने वाले गुज़र गए पर जाम वही है
बाजारों में भाव भी कल उठते चले गए
बिक जाने का मगर दाम वही है
Time has passed us by, my friend, but the evening is the same.
The revelers have passed us by, but the wine is the same.
Yesterday, the prices of things in the bazaar went up high
The price of getting sold here still remains the same.

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Swayam ka Ghuspaithiya

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Meri Maa

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Brahm se Bhram

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Beghar

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Meri Pratiksha

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Tum Preyasi

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Saagar

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Prem

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Mera Shoonya Poora kar do

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Laapata

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Gatimaan jagat (from Eliot)

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Apni Shraddhanjali

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Janm Diwas

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Sab Kuchh Jazb...

Dr. Pariksith Singh

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Vichitra Sunahrapan

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Nidraheen Raatein

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Tum Ek Vishaal Saagar

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Viraasat ka Ghar

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Mera Prarambh

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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Mook Ho Gaye Shabd Mere

Dr. Pariksith Singh, Razi Hashmy

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There Was A Girl I Loved Once 01

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 02

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 03

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 04

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 05

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 06

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 07

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 08

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 09

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 10

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 11

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 12

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 13

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 14

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 15

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 16

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 17

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 18

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 19

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 20

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 21

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 22

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 23

Partho , Dr. Pariksith Singh

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There Was A Girl I Loved Once 24

Partho , Dr. Pariksith Singh

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The Paradigm of Quantum Physics

Dr. Pariksith Singh

One of the great achievements of modern science in the last century is Quantum Physics. While confusing to many, counter-intuitive and disruptive of the traditional Newtonian world-views, it has, nonetheless, liberated modern thought from limitation of senses and common logic. To realise that the Universe at the sub-atomic level is no longer made up of discrete particles and that location of these ‘particles’ is dependent on probability is a revolution in understanding.
My personal encounter with Modern Physics began in the 11th grade, as we were introduced to Maxwell and Planck, Heisenberg and Bohr. I must say that the fascination has only grown. As the insights began to sink in and continue to do so,(yes, even after more than three decades, it grows on one), it became a fascinating story to try to follow and understand.
What happened along the way was that physics that had been boring and Cartesian became alive and resplendent with poetry. Gazing at a table in front of me became as awe-inspiring as gazing at distant stars in the night. While I chose a career in Biology and Medicine, Physics remained a life-long journey of exploration and discovery. However, I must confess that there was still a gap somewhere. It just did not register fully- the monumental realization of what had happened. Until I read Carlo Rovelli and his two books, ‘Seven Brief Lessons on Physics’ and ‘Reality Is Not What It Seems’.
With a lucidity that I have not come across in any of the books on Physics yet, he details how Einstein’s Special and General Theories of Relativity were a tremendous leap of imagination. Einstein’s understanding that gravity and space are not two separate entities, but one and the same, transformed the way we see the world. Space is not emptiness pervaded by a gravitational field but space is gravity. And I was spaced out.
Similarly, when Heisenberg says that 'he imagined that electrons do not always exist; they only exist when someone or something watches, or better, when they are interacting with something else’, changes our understanding of how electrons function. Thus, the world is not built of ‘things’ as our common sense might surmise. How then does this probabilistic transformation affect the natural world we live in, still needs to be further investigated and understood. How does our DNA, for example, get affected by such uncertainty, needs to be ‘quanta-fied’.
Physics continues to search for the Holy Grail, the Unified Field Theory. Various approaches have been tried; the Superstring Theory, the S Matrix, and now the Loop Gravity Theory. Rovelli even tries to understand the self or consciousness in terms of Physics and to this he devotes his last lesson in his “Seven Brief Lessons on Physics’. And this is where he seems to flounder.
For understanding consciousness in terms of physics would be like trying to investigate organic life by investigating inorganic matter or trying to explain mind by explaining organic life. The principles can’t be encapsulated in the older frames of reference. To understand organic life in terms of matter would be a cardinal error and one would have to step out of the frame of reference of matter, evolve new modes of studies and modelling to begin to approach the phenomenon of life.
Consciousness may not be a by-product of quantum phenomenon. It may not be explicable by the Standard Model of elementary particles. Nor are its terms in the realm of thought or physical experiment. Consciousness has to be tackled and studied in entirely different paradigms, determined by its very own nature and characteristics.
Nonetheless, Rovelli’s books are definitely a step forward in higher education. Every student of science, art or humanities would do well to understand the implications of Quantum Physics. It is sad, that even after nearly a hundred years after Quantum Physics was accepted as a valid model to explain the events of the atomic world, its impact on religion, philosophy, theology and other sciences has been minuscule. Religions continue their indoctrinations with Cartesian paradigms. Philosophy has struggled after existentialism, Wittgenstein and deconstruction. And theology still sees a God outside the Universe sitting mightily as a judge or schoolmaster measuring our sins and good deeds for further reward or retribution.
An understanding of Quantum Physics leads to thought more grounded in reality and subtilizes the gross manner in which our sciences and humanities are expounded. I hope that such books are shared with students in high schools everywhere, whether they belong to arts or non-physical sciences. If not, it would be akin to limiting Beethoven’s concertos or Picasso’s art only to students of music or painting.

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Stones of Gwalior Fort

Sharmila Ray

Stones of Gwalior Fort
Once here, the stones half defaced by lichen now, were witness to stories of death and resurrection. Now covered in darkness and tree roots, they are drunk with absence and shadows of transient things. Assorted storylines are embedded in their pores awaiting a perceptible traveler.
One day, perhaps, the stones will speak emerging from bleeding night luminous with sprouted new leaves.

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रुके न तू

Harivansh Rai Bachchan

धरा हिला, गगन गुँजा
नदी बहा, पवन चला
विजय तेरी, विजय तेरीे
ज्योति सी जल, जला
भुजा–भुजा, फड़क–फड़क
रक्त में धड़क–धड़क
धनुष उठा, प्रहार कर
तू सबसे पहला वार कर
अग्नि सी धधक–धधक
हिरन सी सजग सजग
सिंह सी दहाड़ कर
शंख सी पुकार कर
रुके न तू, थके न तू
झुके न तू, थमे न तू
सदा चले, थके न तू
रुके न तू, झुके न तू

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विश्व सारा सो रहा है

Harivansh Rai Bachchan

हैं विचरते स्वप्न सुंदर,
किंतु इनका संग तजकर,
व्योम–व्यापी शून्यता का कौन साथी हो रहा है?
विश्व सारा सो रहा है!
भूमि पर सर सरित् निर्झर,
किंतु इनसे दूर जाकर,
कौन अपने घाव अंबर की नदी में धो रहा है?
विश्व सारा सो रहा है!
न्याय–न्यायधीश भू पर,
पास, पर, इनके न जाकर,
कौन तारों की सभा में दुःख अपना रो रहा है?
बिश्व सारा सो रहा है!

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अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है

Harivansh Rai Bachchan

अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
उठी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चांद औ’ तारे,
उठा तूफान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे,
मगर इस रात में भी लौ लगाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
गगन में गर्व से उठउठ,
गगन में गर्व से घिरघिर,
गरज कहती घटाएँ हैं,
नहीं होगा उजाला फिर,
मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
तिमिर के राज का ऐसा
कठिन आतंक छाया है,
उठा जो शीश सकते थे
उन्होनें सिर झुकाया है,
मगर विद्रोह की ज्वाला जलाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
प्रलय का सब समां बांधे
प्रलय की रात है छाई,
विनाशक शक्तियों की इस
तिमिर के बीच बन आई,
मगर निर्माण में आशा दृढ़ाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
प्रभंजन, मेघ दामिनी ने
न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा,
धरा के और नभ के बीच
कुछ साबित नहीं छोड़ा,
मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
प्रलय की रात में सोचे
प्रणय की बात क्या कोई,
मगर पड़ प्रेम बंधन में
समझ किसने नहीं खोई,
किसी के पथ में पलकें बिछाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

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देखो, टूट रहा है तारा

Harivansh Rai Bachchan

देखो, टूट रहा है तारा!
नभ के सीमाहीन पटल पर
एक चमकती रेखा चलकर
लुप्त शून्य में होती-बुझता एक निशा का दीप दुलारा!
देखो, टूट रहा है तारा!
हुआ न उडुगन में क्रंदन भी,
गिरे न आँसू के दो कण भी
किसके उर में आह उठेगी होगा जब लघु अंत हमारा!
देखो, टूट रहा है तारा!
यह परवशता या निर्ममता
निर्बलता या बल की क्षमता
मिटता एक, देखता रहता दूर खड़ा तारक-दल सारा!
देखो, टूट रहा है तारा!

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अग्निपथ

Harivansh Rai Bachchan

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु स्वेद रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

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जो बीत गई सो बात गई

Harivansh Rai Bachchan

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

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आ रही रवि की सवारी

Harivansh Rai Bachchan

नव-किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी।
आ रही रवि की सवारी।
विहग, बंदी और चारण,
गा रही है कीर्ति-गायन,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।
आ रही रवि की सवारी।
चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह-
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।
आ रही रवि की सवारी।

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सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे

Ramavtar Tyagi

आने पर मेरे बिजली-सी कौंधी सिर्फ तुम्हारे दृग में
लगता है जाने पर मेरे सबसे अधिक तुम्हीं रोओगे !
मैं आया तो चारण-जैसा
गाने लगा तुम्हारा आंगन;
हंसता द्वार, चहकती ड्योढ़ी
तुम चुपचाप खड़े किस कारण ?
मुझको द्वारे तक पहुंचाने सब तो आये, तुम्हीं न आए,
लगता है एकाकी पथ पर मेरे साथ तुम्हीं होओगे!
मौन तुम्हारा प्रश्न चिन्ह है,
पूछ रहे शायद कैसा हूं
कुछ कुछ बादल के जैसा हूं;
मेरा गीत सुन सब जागे, तुमको जैसे नींद आ गई,
लगता मौन प्रतीक्षा में तुम सारी रात नहीं सोओगे!
तुमने मुझे अदेखा कर के
संबंधों की बात खोल दी;
सुख के सूरज की आंखों में
काली काली रात घोल दी;
कल को गर मेरे आंसू की मंदिर में पड़ गई ज़रूरत
लगता है आंचल को अपने सबसे अधिक तुम ही धोओगे!
परिचय से पहले ही, बोलो,
उलझे किस ताने बाने में ?
तुम शायद पथ देख रहे थे,
मुझको देर हुई आने में;
जगभर ने आशीष पठाए, तुमने कोई शब्द न भेजा,
लगता है तुम मन की बगिया में गीतों का बिरवा बोओगे!

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और भी दूँ

Ramavtar Tyagi

मन समर्पित, तन समर्पित,
और यह जीवन समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
माँ तुम्‍हारा ऋण बहुत है, मैं अकिंचन,
किंतु इतना कर रहा, फिर भी निवेदन-
थाल में लाऊँ सजाकर भाल मैं जब भी,
कर दया स्‍वीकार लेना यह समर्पण।
गान अर्पित, प्राण अर्पित,
रक्‍त का कण-कण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
माँज दो तलवार को, लाओ न देरी,
बाँध दो कसकर, कमर पर ढाल मेरी,
भाल पर मल दो, चरण की धूल थोड़ी,
शीश पर आशीष की छाया धनेरी।
स्‍वप्‍न अर्पित, प्रश्‍न अर्पित,
आयु का क्षण-क्षण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।
तोड़ता हूँ मोह का बंधन, क्षमा दो,
गाँव मेरी, द्वार-घर मेरी, ऑंगन, क्षमा दो,
आज सीधे हाथ में तलवार दे-दो,
और बाऍं हाथ में ध्‍वज को थमा दो।
सुमन अर्पित, चमन अर्पित,
नीड़ का तृण-तृण समर्पित।
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।

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मैं दिल्ली हूँ

Ramavtar Tyagi

मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं।
अपने आँगन में सपनों की, हर ओर कितारें देखीं हैं॥
मैंने बलशाली राजाओं के, ताज उतरते देखे हैं।
मैंने जीवन की गलियों से तूफ़ान गुज़रते देखे हैं॥
देखा है; कितनी बार जनम के, हाथों मरघट हार गया।
देखा है; कितनी बार पसीना, मानव का बेकार गया॥
मैंने उठते-गिरते देखीं, सोने-चाँदी की मीनारें।
मैंने हँसते-रोते देखीं, महलों की ऊँची दीवारें॥
गर्मी का ताप सहा मैंने, झेला अनगिनत बरसातों को।
मैंने गाते-गाते काटा जाड़े की ठंडी रातों को॥
पतझर से मेरा चमन न जाने, कितनी बार गया लूटा।
पर मैं ऐसी पटरानी हूँ, मुझसे सिंगार नहीं रूठा॥
आँखें खोली; देखा मैंने, मेरे खंडहर जगमगा गए।
हर बार लुटेरे आ-आकर, मेरी क़िस्मत को जगा गए ॥
मुझको सौ बार उजाड़ा है, सौ बार बसाया है मुझको।
अक्सर भूचालों ने आकर, हर बार सजाया है मुझको॥
यह हुआ कि वर्षों तक मेरी, हर रात रही काली-काली।
यह हुआ कि मेरे आँगन में, बरसी जी भर कर उजियाली।।
वर्षों मेरे चौराहों पर, घूमा है ज़ालिम सन्नाटा।
मुझको सौभाग्य मिला मैंने, दुनिया भर को कंचन बाँटा।।
जब चाहा मैंने तूफ़ानों के, अभिमानों को कुचल दिया।
हँसकर मुरझाई कलियों को, मैंने उपवन में बदल दिया।।
मुझ पर कितने संकट आए, आए सब रोकर चले गए।
युद्धों के बरसाती बादल, मेरे पग धोकर चले गए।।
कब मेरी नींव रखी किसने, यह तो मुझको भी याद नहीं।
पूँछू किससे; नाना-नानी, मेरा कोई आबाद नहीं।।
इतिहास बताएगा कैसे, वह मेरा नन्हा भाई है।
उसको इन्सानों की भाषा तक, मैंने स्वयं सिखाई है।।
हाँ, ग्रन्थ महाभारत थोड़ा, बचपन का हाल बताता है।
मेरे बचपन का इन्द्रप्रस्थ ही, नाम बताया जाता है।।
कहते हैं मुझे पांडवों ने ही, पहली बार बसाया था।
और उन्होंने इन्द्रपुरी से सुन्दर मुझे सजाया था।।
मेरी सुन्दरता के आगे सब, दुनिया पानी भरती थी।
सुनते हैं देश विदेशो पर, तब भी मैं शासन करती थी।।
किन्तु महाभारत से जो, हर ओर तबाही आई थी।
वह शायद मेरे घर में भी, कोई वीरानी लाई थी।।
बस उससे आगे सदियों तक, मेरा इतिहास नहीं मिलता।
मैं कितनी बार बसी-उजड़ी, इसका कुछ पता नहीं चलता।।
ईसा से सात सदी पीछे, फिर बन्द कहानी शुरू हुई।
आठवीं सदी के आते ही, भरपूर जवानी शुरू हुई।।
सचमुच तो राजा अनंगपाल ने फिरसे मुझे बसाया था।
मेरी शोभा के आगे तब, नन्दन-वन भी शरमाया था।।
मेरे पाँवों को यमुना ने, आंखों से मल-मल धोया था।
बादल ने मेरे होंठों को आ-आकर स्वयं भिगोया था।।

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आँचल बुनते रह जाओगे

Ramavtar Tyagi

मैं तो तोड़ मोड़ के बन्धन,
अपने गाँव चला जाऊँगा,
तुम आकर्षक सम्बंधों का,
आँचल बुनते रह जाओगे।
मेला काफी दर्शनीय है
पर मुझको कुछ जमा नहीं है,
इन मोहक कागजी खिलौनों में
मेरा मन रमा नहीं है।
मैं तो रंग मंच से अपने
अनुभव गाकर उठ जाऊँगा
लेकिन, तुम बैठे गीतों का
गुँजन सुनते रह जाओगे।
आँसू नहीं फला करते है,
रोने वाले क्यों रोता है?
जीवन से पहले पीड़ा का
शायद अन्त नहीं होता है।
मै तो किसी सर्द मौसम की
बाहों में मुरझा जाऊँगा
तुम केवल मेरे फूलों को
गुमसुम चुनते रहे जाओगे।
मुझको मोह जोड़ना होगा,
केवल जलती चिंगारी से।
मुझसे सन्धि नहीं हो पाती
जीवन की हर लाचारी से।
मैं तो किसी भँवर के कन्धे
चढ़कर पार उतर जाऊँगा,
तट पर बैठे इसी तरह से
तुम सिर धुनते रह जाआगे।

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चाँदी की उर्वशी

Ramavtar Tyagi

चाँदी की उर्वशी न कर दे युग के तप संयम को खंडित
भर कर आग अंक में मुझको सारी रात जागना होगा ।
मैं मर जाता अगर रात भी मिलती नहीं सुबह को खोकर
जीवन का जीना भी क्या है, गीतों का शरणागत होकर,
मन है राजरोग का रोगी, आशा है शव की परिणीता
डूब न जाये वंश प्यास का पनघट मुझे त्यागना होगा ॥
सपनों का अपराध नहीं है, मन को ही भा गयी उदासी
ज्यादा देर किसी नगरी में रुकते नहीं संत सन्यासी
जो कुछ भी माँगोगे दूँगा ये सपने तो परमहंस हैं
मुझको नंगे पाँव धार पर आँखें मूँद भागना होगा ॥
गागर क्या है - कंठ लगाकर जल को रोक लिया माटी ने
जीवन क्या है - जैसे स्वर को वापिस भेज दिया घाटी ने,
गीतों का दर्पण छोटा है जीवन का आकार बड़ा है
जीवन की खातिर गीतों को अब विस्तार माँगना होगा ॥
चुनना है बस दर्द सुदामा लड़ना है अन्याय कंस से
जीवन मरणासन्न पड़ा है, लालच के विष भरे दंश से
गीता में जो सत्य लिखा है, वह भी पूरा सत्य नहीं है
चिन्तन की लछ्मन रेखा को थोड़ा आज लाँघना होगा ॥

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Inkaar

Avtar Singh Pash

ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਆਸ ਨ ਕਰਿਓ ਕਿ ਮੈਂ ਖੇਤਾਂ ਦਾ ਪੁੱਤ ਹੋ ਕੇ
ਤਹਾਡੇ ਚਗਲੇ ਹੋਏ ਸਵਾਦਾਂ ਦੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗਾ
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੜ੍ਹ 'ਚ ਰੁੜ੍ਹ ਜਾਂਦੀ ਹੈ
ਸਾਡੇ ਬੱਚਿਆਂ ਦੀ ਤੋਤਲੀ ਕਵਿਤਾ
ਤੇ ਸਾਡੀਆਂ ਧੀਆਂ ਦਾ ਕੰਜਕ ਜਿਹਾ ਹਾਸਾ
ਮੈਂ ਤਾਂ ਜਦ ਵੀ ਕੀਤੀ-ਖਾਦ ਦੇ ਘਾਟੇ
ਕਿਸੇ ਗਰੀਬੜੀ ਦੀ ਹਿੱਕ ਵਾਂਗੂ ਪਿਚਕ ਗਏ ਗੰਨਿਆਂ ਦੀ ਗੱਲ ਹੀ ਕਰਾਂਗਾ
ਮੈਂ ਦਲਾਨ ਦੇ ਖੂੰਜੇ 'ਚ ਪਈ ਸੌਣੀ ਦੀ ਫਸਲ
ਤੇ ਦਲਾਨ ਦੇ ਬੂਹੇ ਤੇ ਖੜੇ ਸਿਆਲ ਦੀ ਹੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗਾ।
ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਆਸ ਨ ਕਰਿਓ ਕਿ ਮੈਂ ਸਰਦੀ ਦੀ ਰੁੱਤੇ ਖਿੜਨ ਵਾਲੇ
ਫੁੱਲਾਂ ਦੀਆਂ ਕਿਸਮਾਂ ਦੇ ਨਾਂ 'ਤੇ
ਪਿੰਡ ਦੀਆਂ ਕੁੜੀਆਂ ਦੇ ਨਾਂ ਕੁਨਾਂ ਧਰਾਂਗਾ
ਮੈਂ ਬੈਂਕ ਦੇ ਸੈਕਟਰੀ ਦੀਆਂ ਖਚਰੀਆਂ ਮੁੱਛਾਂ
ਸਰਪੰਚ ਦੀ ਥਾਣੇ ਤੱਕ ਲੰਮੀ ਪੂਛ ਦੀ
ਤੇ ਉਸ ਪੂਰੇ ਚਿੜੀਆ-ਘਰ ਦੀ
ਜੋ ਮੈਂ ਆਪਣੀ ਹਿੱਕ ਉੱਤੇ ਪਾਲ ਰੱਖਿਆ ਹੈ
ਜਾਂ ਉਸ ਅਜਾਇਬ ਘਰ ਦੀ
ਜੋ ਮੈਂ ਅਪਣੀ ਹਿੱਕ ਅੰਦਰ ਸਾਂਭ ਰੱਖਿਆ ਹੈ
ਜਾਂ ਏਦਾਂ ਦੀ ਹੀ ਕੋਈ ਕਰੜ ਬਰੜੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗਾ
ਮੇਰੇ ਲਈ ਦਿਲ ਤਾਂ ਬੱਸ ਇਕ ਪਾਨ ਦੇ ਪੱਤੇ ਵਰਗਾ ਲੋਥੜਾ ਹੈ
ਮੇਰੇ ਲਈ ਹੁਸਨ ਕੋਈ ਮੱਕੀ ਦੀ ਲੂਣ ਭੁੱਕੀ ਹੋਈ ਰੋਟੀ ਜਿਹੀ ਲੱਜ਼ਤ ਹੈ
ਮੇਰੇ ਲਈ ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਘਰ ਦੀ ਸ਼ਰਾਬ ਵਾਂਗ
ਲੁਕ ਲੁਕ ਪੀਣ ਦੀ ਕੋਈ ਸ਼ੈਅ ਹੈ
ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਆਸ ਨ ਕਰਿਓ ਕਿ ਮੈਂ ਖਰਗੋਸ਼ ਵਾਂਗ
ਰੋਹੀਆਂ ਦੀ ਕੂਲੀ ਮਹਿਕ ਨੂੰ ਪੋਲੇ ਜਹੇ ਸੁੰਘਾਂ
ਮੈਂ ਹਰ ਕਾਸੇ ਨੂੰ ਜੋਤਾ ਲੱਗੇ ਹੋਏ ਬਲਦਾਂ ਦੇ ਵਾਂਗ
ਖੁਰਲੀ ਉੱਤੇ ਸਿੱਧਾ ਹੋ ਕੇ ਟੱਕਰਿਆ ਹਾਂ
ਮੈਂ ਜੱਟਾਂ ਦੇ ਸਾਧ ਹੋਣ ਤੋਂ ਉਰ੍ਹਾਂ ਦਾ ਸਫਰ ਹਾਂ
ਮੈਂ ਬੁੱਢੇ ਮੋਚੀ ਦੀ ਗੁੰਮੀ ਹੋਈ ਅੱਖਾਂ ਦੀ ਲੋਅ ਹਾਂ
ਮੈਂ ਟੁੰਡੇ ਹੌਲਦਾਰ ਦੇ ਸੱਜੇ ਹੱਥ ਦੀ ਯਾਦ ਹਾਂ ਕੇਵਲ
ਮੈਂ ਪਿੰਡੇ ਵਕਤ ਦੇ, ਚੱਪਾ ਸਦੀ ਦਾ ਦਾਗ ਹਾਂ ਕੇਵਲ
ਤੇ ਮੇਰੀ ਕਲਪਣਾ, ਉਸ ਲੁਹਾਰ ਦੇ ਥਾਂ ਥਾਂ ਤੋਂ ਲੂਸੇ ਮਾਸ ਵਰਗੀ ਹੈ
ਜੋ ਬੇਰਹਿਮ ਅਸਮਾਨ ਤੇ ਖਿਝਿਆ ਰਹੇ, ਇਕ ਹਵਾ ਦੇ ਬੁੱਲੇ ਲਈ
ਜੀਹਦੇ ਹੱਥ ਵਿਚਲਾ ਚਊ ਦਾ ਫਾਲਾ
ਕਦੀ ਤਲਵਾਰ ਬਣ ਜਾਵੇ, ਕਦੀ ਬੱਸ ਪੱਠਿਆਂ ਦੀ ਪੰਡ ਰਹਿ ਜਾਵੇ
ਮੈਂ ਹੁਣ ਤੁਹਾਡੇ ਲਈ ਹਾਰਮੋਨੀਅਮ ਦਾ ਪੱਖਾ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ
ਮੈਂ ਭਾਂਡੇ ਮਾਂਜਦੀ ਝੀਰੀ ਦੀਆਂ ਉਂਗਲਾਂ 'ਚੋਂ ਸਿੰਮਦਾ ਰਾਗ ਹਾਂ ਕੇਵਲ
ਮੇਰੇ ਕੋਲ ਸੁਹਜ ਦੀ ਉਸ ਸੁਪਨ ਸੀਮਾ ਤੋਂ ਉਰ੍ਹੇ
ਹਾਲਾਂ ਕਰਨ ਨੂੰ ਬਹੁਤ ਗੱਲਾਂ ਹਨ
ਅਜੇ ਮੈਂ ਧਰਤ ਤੇ ਚਾਈ
ਕਿਸੇ ਸੀਰੀ ਦੇ ਕਾਲੇ-ਸ਼ਾਹ ਬੁੱਲ੍ਹਾਂ ਜਹੀ ਰਾਤ ਦੀ ਹੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗਾ
ਉਸ ਇਤਿਹਾਸ ਦੀ
ਜੋ ਮੇਰੇ ਬਾਪ ਦੇ ਧੁੱਪ ਨਾਲ ਲੂਸੇ ਮੌਰਾਂ ਉੱਤੇ ਉੱਕਰਿਆ ਹੈ
ਜਾਂ ਅਪਣੀ ਮਾਂ ਦੇ ਪੈਰੀਂ ਪਾਟੀਆਂ ਬਿਆਈਆਂ ਦੇ ਭੂਗੋਲ ਦੀ ਹੀ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗਾ
ਮੇਰੇ ਤੋਂ ਆਸ ਨ ਕਰਿਓ ਕਿ ਮੈਂ ਖੇਤਾਂ ਦਾ ਪੁੱਤ ਹੋ ਕੇ
ਤੁਹਾਡੇ ਚਗਲੇ ਹੋਏ ਸਵਾਦਾਂ ਦੀ ਕੋਈ ਗੱਲ ਕਰਾਂਗਾ
ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਹੜ੍ਹ 'ਚ ਰੁੜ੍ਹ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਸਾਡੇ ਬੱਚਿਆਂ ਦੀ ਤੋਤਲੀ ਕਵਿਤਾ
ਤੇ ਸਾਡੀਆਂ ਧੀਆਂ ਦਾ ਕੰਜਕ ਜਿਹਾ ਹਾਸਾ

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स्मृतियाँ

Subhadra Kumari Chauhan

क्या कहते हो? किसी तरह भी
भूलूँ और भुलाने दूँ?
गत जीवन को तरल मेघ-सा
स्मृति-नभ में मिट जाने दूँ?
शान्ति और सुख से ये
जीवन के दिन शेष बिताने दूँ?
कोई निश्चित मार्ग बनाकर
चलूँ तुम्हें भी जाने दूँ?
कैसा निश्चित मार्ग? ह्रदय-धन
समझ नहीं पाती हूँ मैं
वही समझने एक बार फिर
क्षमा करो आती हूँ मैं।
जहाँ तुम्हारे चरण, वहीँ पर
पद-रज बनी पड़ी हूँ मैं
मेरा निश्चित मार्ग यही है
ध्रुव-सी अटल अड़ी हूँ मैं।
भूलो तो सर्वस्व ! भला वे
दर्शन की प्यासी घड़ियाँ
भूलो मधुर मिलन को, भूलो
बातों की उलझी लड़ियाँ।
भूलो प्रीति प्रतिज्ञाओं को
आशाओं विश्वासों को
भूलो अगर भूल सकते हो
आंसू और उसासों को।
मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन
सुख या शांति नहीं होगी
यही बात तुम भी कहते थे
सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।
सुख को मधुर बनाने वाले
दुःख को भूल नहीं सकते
सुख में कसक उठूँगी मैं प्रिय
मुझको भूल नहीं सकते।
मुझको कैसे भूल सकोगे
जीवन-पथ-दर्शक मैं थी
प्राणों की थी प्राण ह्रदय की
सोचो तो, हर्षक मैं थी।
मैं थी उज्ज्वल स्फूर्ति, पूर्ति
थी प्यारी अभिलाषाओं की
मैं ही तो थी मूर्ति तुम्हारी
बड़ी-बड़ी आशाओं की।
आओ चलो, कहाँ जाओगे
मुझे अकेली छोड़, सखे!
बंधे हुए हो ह्रदय-पाश में
नहीं सकोगे तोड़, सखे!

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मेरा नया बचपन

Subhadra Kumari Chauhan

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी।
चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?
ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी।
किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया।
रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे।
मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया।
दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे।
वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई।
लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी।
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी।
दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी।
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी।
मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने।
सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं।
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं।
माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है।
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है।
किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना।
आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति।
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति।
वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप।
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप?
मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी।
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी।
'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आई थी।
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लाई थी।
पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा।
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा।
मैंने पूछा 'यह क्या लाई?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'।
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'।
पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया।
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया।
मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ।
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ।
जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया।
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया।

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इसका रोना

Subhadra Kumari Chauhan

तुम कहते हो - मुझको इसका रोना नहीं सुहाता है ।
मैं कहती हूँ - इस रोने से अनुपम सुख छा जाता है ।
सच कहती हूँ, इस रोने की छवि को जरा निहारोगे ।
बड़ी-बड़ी आँसू की बूँदों पर मुक्तावली वारोगे । 1 ।

ये नन्हे से होंठ और यह लम्बी-सी सिसकी देखो ।
यह छोटा सा गला और यह गहरी-सी हिचकी देखो ।
कैसी करुणा-जनक दृष्टि है, हृदय उमड़ कर आया है ।
छिपे हुए आत्मीय भाव को यह उभार कर लाया है । 2 ।

हँसी बाहरी, चहल-पहल को ही बहुधा दरसाती है ।
पर रोने में अंतर तम तक की हलचल मच जाती है ।
जिससे सोई हुई आत्मा जागती है, अकुलाती है ।
छुटे हुए किसी साथी को अपने पास बुलाती है । 3 ।

मैं सुनती हूँ कोई मेरा मुझको अहा ! बुलाता है ।
जिसकी करुणापूर्ण चीख से मेरा केवल नाता है ।
मेरे ऊपर वह निर्भर है खाने, पीने, सोने में ।
जीवन की प्रत्येक क्रिया में, हँसने में ज्यों रोने में । 4 ।

मैं हूँ उसकी प्रकृति संगिनी उसकी जन्म-प्रदाता हूँ ।
वह मेरी प्यारी बिटिया है मैं ही उसकी प्यारी माता हूँ ।
तुमको सुन कर चिढ़ आती है मुझ को होता है अभिमान ।
जैसे भक्तों की पुकार सुन गर्वित होते हैं भगवान । 5 ।

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झांसी की रानी

Subhadra Kumari Chauhan

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।
वीर शिवाजी की गाथायें उसको याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़।
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई थी झांसी में।
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव को मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।
निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजौर, सतारा,कर्नाटक की कौन बिसात?
जब कि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी रोईं रनिवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,
'नागपुर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।
यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।
हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर,पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वंद असमानों में।
ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजई रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।
अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।
जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

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ठुकरा दो या प्यार करो

Subhadra Kumari Chauhan

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं
धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं
मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी
धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं
कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं
नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी
पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो
मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ
चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

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जलियाँवाला बाग में बसंत

Subhadra Kumari Chauhan

हाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।
                                                   
परिमल-हीन पराग दाग सा ब

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Palanquin Bearers

Sarojini Naidu

Lightly, O lightly we bear her along,
She sways like a flower in the wind of our song;
She skims like a bird on the foam of a stream,
She floats like a laugh from the lips of a dream.
Gaily, O gaily we glide and we sing,
We bear her along like a pearl on a string.
Softly, O softly we bear her along,
She hangs like a star in the dew of our song;
She springs like a beam on the brow of the tide,
She falls like a tear from the eyes of a bride.
Lightly, O lightly we glide and we sing,
We bear her along like a pearl on a string.

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In The Forest

Sarojini Naidu

Here, O my heart, let us burn the dear dreams that are dead,
Here in this wood let us fashion a funeral pyre
Of fallen white petals and leaves that are mellow and red,
Here let us burn them in noon's flaming torches of fire.
We are weary, my heart, we are weary, so long we have borne
The heavy loved burden of dreams that are dead, let us rest,
Let us scatter their ashes away, for a while let us mourn;
We will rest, O my heart, till the shadows are gray in the west.
But soon we must rise, O my heart, we must wander again
Into the war of the world and the strife of the throng;
Let us rise, O my heart, let us gather the dreams that remain,
We will conquer the sorrow of life with the sorrow of song.

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Indian Weavers

Sarojini Naidu

Weavers, weaving at break of day,
Why do you weave a garment so gay? . . .
Blue as the wing of a halcyon wild,
We weave the robes of a new-born child.
Weavers, weaving at fall of night,
Why do you weave a garment so bright? . . .
Like the plumes of a peacock, purple and green,
We weave the marriage-veils of a queen.
Weavers, weaving solemn and still,
What do you weave in the moonlight chill? . . .
White as a feather and white as a cloud,
We weave a dead man's funeral shroud.

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Queen's Rival

Sarojini Naidu

Queen Gulnaar sat on her ivory bed,
Around her countless treasures were spread;
Her chamber walls were richly inlaid
With agate, porphyry, onyx and jade;
The tissues that veiled her delicate breast,
Glowed with the hues of a lapwing's crest;
But still she gazed in her mirror and sighed
"O King, my heart is unsatisfied."
King Feroz bent from his ebony seat:
"Is thy least desire unfulfilled, O Sweet?
"Let thy mouth speak and my life be spent
To clear the sky of thy discontent."
"I tire of my beauty, I tire of this
Empty splendour and shadowless bliss;
"With none to envy and none gainsay,
No savour or salt hath my dream or day."
Queen Gulnaar sighed like a murmuring rose:
"Give me a rival, O King Feroz."

II
King Feroz spoke to his Chief Vizier:
"Lo! ere to-morrow's dawn be here,
"Send forth my messengers over the sea,
To seek seven beautiful brides for me;
"Radiant of feature and regal of mien,
Seven handmaids meet for the Persian Queen."
. . . . .
Seven new moon tides at the Vesper call,
King Feroz led to Queen Gulnaar's hall
A young queen eyed like the morning star:
"I bring thee a rival, O Queen Gulnaar."
But still she gazed in her mirror and sighed:
"O King, my heart is unsatisfied."
Seven queens shone round her ivory bed,
Like seven soft gems on a silken thread,
Like seven fair lamps in a royal tower,
Like seven bright petals of Beauty's flower
Queen Gulnaar sighed like a murmuring rose
"Where is my rival, O King Feroz?"

III
When spring winds wakened the mountain floods,
And kindled the flame of the tulip buds,
When bees grew loud and the days grew long,
And the peach groves thrilled to the oriole's song,
Queen Gulnaar sat on her ivory bed,
Decking with jewels her exquisite head;
And still she gazed in her mirror and sighed:
"O King, my heart is unsatisfied."
Queen Gulnaar's daughter two spring times old,
In blue robes bordered with tassels of gold,
Ran to her knee like a wildwood fay,
And plucked from her hand the mirror away.
Quickly she set on her own light curls
Her mother's fillet with fringes of pearls;
Quickly she turned with a child's caprice
And pressed on the mirror a swift, glad kiss.
Queen Gulnaar laughed like a tremulous rose:
"Here is my rival, O King Feroz."

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Mantras from Savitri

Sri Aurobindo Ghosh

All can be done
if the God-touch is there
~
Only a little
The God-light can stay.
~
A traveller between summit and abyss.
~
The human in him
Paced with the Divine.
~
God shall grow up
While the wise men
Talk and sleep.
~
We are sons of God
And must be even as he.
~
Beyond earth’s longitudes and latitudes.
~
Our life
Is a holocaust
Of the Supreme.
~
Oh, surely one day
He shall come to our cry.
~
None can reach heaven
Who has not
Passed through hell.
~
Our human state
Cradles the future god.
~
The One by whom all live,
Who lives by none.
~
Escape brings not the victory and the crown.
~
In absolute silence
Sleeps an absolute Power.
~
A God comes down greater by the fall.
~
A giant dance of Shiva tore the past.
~
Whoever is too great
Must lonely live.
~
The soul in man
Is greater
Than his fate.
~
The life you lead
Conceals the light you are.
~
The great are strongest
When they stand alone.
~
The day-bringer
Must walk
In darkest night.
~
Our life is a march
To a victory
Never won.
~
Man can accept his fate,
He can refuse.
~
His failure is not failure
Whom God leads.
~
I wear the face of Kali
When I kill.
~
One man’s perfection
Still can save the world.
~
He who would save the world
Must share its pain.
~
All is too little that the world can give.
~
I shall save earth,
If earth consents
To be saved.
~
He Who Chooses The Infinite Has Been Chosen by the Infinite
~
Truth born too soon
Might break
The imperfect earth.
~
A cave of darkness guards the eternal Light.
~
A death-bound littleness is not all we are.
~
A Light there is that leads,
A Power that aids.
~
A moment sees,
The ages toil to express.
~
All our earth starts from mud and ends in sky.
All rose from the silence;
All goes back to its hush.
~
All things are real
That here are only dreams.
~
An idiot hour destroys what centuries made.
~
Love is a yearning
Of the One
For the One.
~
Mortality bears ill
The eternal’s touch.
~
The spirit rises mightier
By defeat.
~
The soul that can
Live alone with itself
Meets God.
~
There is a purpose
In each stumble and fall.
~
A future knowledge is an added pain.
~
To know is best,
However hard to bear.
~
But few are they who tread the sunlit path.
~
Death helps us not,
Vain is the hope to cease.
~
Earth is the chosen place of mightiest souls.
~
Eternity speaks, none understands its word.
~
Fate shall be changed by an unchanging will.
~
For joy
And not for sorrow
Earth was made.
~
Heaven’s call is rare,
Rarer the heart that heeds.
~
My God is Love
And sweetly suffers all.
~
Only the pure in soul
Can walk in light.
~
The gods are still too few
In mortal forms.
~
We are greater
Than our thoughts.
~
Even the body shall remember God.

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Ascent: The Silence

Sri Aurobindo Ghosh

Into the Silence, into the Silence,
Arise, O Spirit immortal,
Away from the turning Wheel, breaking the magical Circle.
Ascend, single and deathless:
Care no more for the whispers and the shoutings in the darkness,
Pass from the sphere of the grey and the little,
Leaving the cry and the struggle,
Into the Silence forever.
Vast and immobile, formless and marvellous,
Higher than Heaven, wider than the universe,
In a pure glory of being,
In a bright stillness of self-seeing,
Communing with a boundlessness voiceless and intimate,
Make thy knowledge too high for thought, thy joy too deep for emotion;
At rest in the unchanging Light, mute with the wordless self-vision,
Spirit, pass out of thyself; Soul, escape from the clutch of Nature.
All thou hast seen cast from thee, O Witness.
Turn to the Alone and the Absolute, turn to the Eternal:
Be only eternity, peace and silence,
world-transcending nameless Oneness,
Spirit immortal.

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Ascent: Beyond the Silence

Sri Aurobindo Ghosh

Out from the Silence, out from the Silence,
Carrying with thee the ineffable Substance,
Carrying with thee the splendour and wideness,
Ascend, O Spirit immortal.
Assigning to Time its endless meaning,
Blissful enter into the clasp of the Timeless.
Awake in the living Eternal, taken to the bosom of love of the Infinite,
Live self-found in his endless completeness,
Thy heart close to the heart of the Godhead for ever.
Vast, God-possessing, embraced by the Wonderful,
Lifted by the All-Beautiful into his infinite beauty,
Love shall envelop thee endless and fathomless,
Joy unimaginable, Ecstasy illimitable,
Knowledge omnipotent, Might omniscient,
Light without darkness, Truth that is dateless.
One with the Transcendent, calm, universal,
Single and free, yet innumerably living,
All in thyself and thyself in all dwelling,
Act in the world with thy being beyond it.
Soul, exceed life’s boundaries; Spirit, surpass the universe.
Outclimbing the summits of Nature,
Transcending and uplifting the soul of the finite,
Rise with the world in thy bosom,
O Word gathered into the heart of the Ineffable.
One with the Eternal, live in his infinity,
Drowned in the Absolute, found in the Godhead,
Swan of the supreme and spaceless ether wandering winged through the universe,
Spirit immortal.

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Life

Sri Aurobindo Ghosh

Mystic Miracle, daughter of Delight,
Life, thou ecstasy,
Let the radius of thy flight
Be eternity.
On thy wings thou bearest high
Glory and disdain,
Godhead and mortality,
Ecstasy and pain.
Take me in thy wild embrace
Without weak reserve
Body dire and unveiled face;
Faint not, Life, nor swerve.
All thy bliss I would explore,
All thy tyranny.
Cruel like the lion’s roar,
Sweet like springtide be.
Like a Titan I would take,
Like a God enjoy,
Like a man contend and make,
Revel like a boy.
More I will not ask of thee,
Nor my fate would choose;
King or conquered let me be,
Live or lose.
Even in rags I am a god;
Fallen, I am divine;
High I triumph when down-trod,
Long I live when slain.

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Nirvana

Sri Aurobindo Ghosh

All is abolished but the mute Alone.
The mind from thought released, the heart from grief,
Grow inexistent now beyond belief;
There is no I, no Nature, known-unknown.
The city, a shadow picture without tone,
Floats, quivers unreal; forms without relief
Flow, a cinema’s vacant shapes; like a reef
Foundering in shoreless gulfs the world is done.
Only the illimitable Permanent
Is here. A Peace stupendous, featureless, still.
Replaces all, – what once was I, in It
A silent unnamed emptiness content
Either to fade in the Unknowable
Or thrill with the luminous seas of the Infinite.

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The Infinitesimal Infinite

Sri Aurobindo Ghosh

Out of a still Immensity all came!
These million universes were to it
The poor light-bubbles of a trivial game,
A fragile glimmer in the Infinite.
It could not find its soul in all that vast:
It drew itself into a little speck
Infinitesimal, ignobly cast
Out of earth’s mud and slime strangely awake,-
A tiny plasm on a little globe,
In the small system of a dwarflike sun,
A little life wearing the flesh for robe,
A little mind winged through wide space to run!
It lived, it knew, it saw its self sublime,
Deathless, outmeasuring Space, outlasting Time.

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The Looking Glass

Kamala Surayya

Getting a man to love you is easy
Only be honest about your wants as woman. 
Stand nude before the glass with him,
So that he sees himself the stronger one
And believes it so, and you so much more
Softer, younger, lovelier.
Admit your Admiration.
Notice the perfection
Of his limbs, his eyes reddening under the shower,
The shy walk across the bathroom floor,
Dropping towels, and the jerky way he urinates.
All the fond details that make him male 
And your only man.
Gift him all,
Gift him what makes you woman,
The scent of long hair,
The musk of sweat between the breasts,
The warm shock of menstrual blood,
And all your endless female hungers.
Oh yes, getting a man to love is easy, 
But living without him afterwards may have to be faced.
A living without life when you move around, 
Meeting strangers, with your eyes that gave up their search, 
With ears that hear only his last voice calling out your name
And your body which once under his touch had gleamed
Like burnished brass, now drab and destitute.

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Couplet by Ikram

Ikram Rajasthani

हमारी बातों में नफरत की कोई बू नहीं आती
हमारे बीच में हिंदी या फिर उर्दू नहीं आती

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Faiz Ahmed Faiz: The Neo-Classicist

Dr. Pariksith Singh

Last night, your lost memories came to me
As spring steals into the wilderness
As the morning breeze skims the desert gently
As a patient finds solace without cause
These lines, among the peaks of Urdu poetry, are written by Faiz Ahmed Faiz, widely considered as one of the greatest poets from the Indian sub-continent. Born in Sialkot, British India, in 1911, he stayed on in Pakistan after independence. A classical poet to the core, he extended the traditional idiom of Urdu poetry. Where in the past Urdu poetry was restricted to the Saaqi, the wine, roses and nightingales, he changed the concept of the divine wine-bearer to mean the social and political revolution which would bring justice, freedom and equality to the oppressed. For him love for the Saaqi became a call to arms to create a new world order based on the principles of liberty and fraternity. It is perhaps these opinions that got him in trouble with the authorities. Arrested for subversive activities twice in Pakistan, he spent about 5 years in prison between 1951 and 1959. Yet, this did not blunt his desire to speak on behalf of the underprivileged in various capacities throughout his life.
Faiz was Chief Editor of Pakistan Times, and later, Editor of Lotus magazine published by Afro-Asian Reuters Association. He was awarded the prestigious Lenin award by U.S.S.R. in 1962. In his day he was deemed one of the worthiest nominees for the Nobel Prize. That he did not win it is one of the gravest omissions in the history of the award. Faiz passed away in 1985.
He remains one of the most romantic poets in world literature, comparable to Keats, Shelley, Wordsworth or Tagore. However, what makes his poetry unique is how it moves effortlessly between romanticism and reality. One of his most famous poems, typical of his style, starts off in this manner:
Do not ask for love as before, my dear!
I had thought that if you are, life is light,
If you are sad, what quarrel is worth the world’s sadness?
Your face is the reason for spring in the Universe.
What else is there in the cosmos if not your eyes?
But as the poet realizes the harsh realities of life, he is forced to confront them and sing a different tune:
Life has more torments than love alone
And greater solace than being with the loved one.
Do not ask for love as before, my dear!
Faiz does not jar the reader’s sensibility with startling juxtapositions or shock the brain with post-modern effects, merely for the sake of it. Each line is measured, deliberate, refined, quiet. Yet, when he makes a transition from one thought process to another, the results could not be more striking, in part due to their subdued texture underlining a sharp contrast. In the example given above, we find a clear contradiction between two visions and compelling movements. One is the pull of the beloved; the other, the suffering of his people. Faiz does not scream, he whispers; when he speaks softly, you pay attention because of what he has to say, not solely because of how he says it.
He does not break rhyme or rhythm like free-verse poets. His images are apt and not arbitrary like Lorca. His music rings with compassion, subtlety, wit and innovation in its neo-formalism. If Ghalib was the Father of Urdu Poetry, Faiz, to my mind, is the Father of Modern Urdu Poetry.
Faiz is old but new, traditional but contemporary. His feelings are true and deep. Whether it is in dealing with his beloved or the masses, his is not rhetoric or high-pitched falsetto. One feels the presence of a genuine emotion, an individual concern growing so deep that it becomes universal. Faiz cannot be classified only as a communist, even though he was associated closely with the socialist movement; his empathy makes him a true bearer of his religion even though he seems irreligious on the face of it. His compassion rings true and cannot be restricted to a movement or philosophy.
Faiz loved his people and his land deeply. But he was not blinded by his love. Being a true humanist, he showed his appreciation for all peoples and lands. He was able to overlook the cultural and religious baggage that well-meaning people carry, especially when it came to the rivalry between India and Pakistan. That he remained as popular in India as in Pakistan is testament to his reach beyond borders.
For any student of Modern Poetry, Faiz remains extremely significant. He needs to be studied until he becomes a part of one’s blood. Faiz ranks among the great poets of any language. He is as great a peak as Tagore, Yeats, Neruda, Rilke, Eliot or Sri Aurobindo.
Classics never die. They grow as you mature and mature as you grow. The poetry of Ghalib or Tagore or Shakespeare or Faiz is immortal and worthy of being read again and again till it changes us for the better. Even in suffering, it sings of joy and hope.
Be close to me…my assassin, my beloved, stay close to me…
When the night moves, the dark night, having drunk the red blood of skies…
Laughing, singing, ringing the epileptic anklet of pain…
When the night moves, funereal and empty…
Stay close to me…

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The Ghazal: A Poorly Adapted Form in English

Dr. Pariksith Singh

The ghazal is perhaps one of the most exotic forms of poetry. Steeped in oriental traditions and imagery, it stands unique in being a major non-narrative lyrical form of poetry in world literature. No other form poem follows the classical rules of rhyme and rhythm, and yet, gives a complete leeway to the poet to vary subject matter at will with each stanza.
Briefly, a ghazal in its classical form comprises an odd number of thematically related or unrelated couplets strung together by a common rhythm and a rhyme scheme (aa, ba, ca, da, ea, …). On the one hand, this makes it highly conducive to poetry of love and mysticism allowing impulsive shifts of thought and free association; on the other, it also places greater demands on the poet in some ways. As one critic has pointed out, the ghazal is easy to write but difficult to master. Free verse may hide (or reveal, depending on how one may look at it) much of a poet’s mediocrity but a ghazal will starkly highlight it. Even in Urdu, there are seldom more than a few poets writing quality ghazals at one time and a good ghazal is as difficult to write as perhaps a good sestina.
The word ghazal derives from the word ghazaal from Arabic, which means a gazelle. And that perhaps sums up in one word what the form stands for. Delicate and graceful, quick and erratic, the gazelle moves in leaps and bounds, often changing directions from one jump to another, often reversing its course entirely, capricious yes, but ever delightfully energetic and beautiful.
Historically, the ghazal originated in Persia and migrated along with the moguls to India. There it became one of the foremost vehicles of poetic expression of a new language, Urdu, which came out of a commingling of Arabic, Persian, Sanskrit, Punjabi and Hindi. In Urdu Literature, its importance rivals that of a sonnet in English.
The Exemplars of the Urdu Ghazal
The ghazal was used highly successfully by Mirza Ghalib, easily the greatest poet in Urdu to this date. He exploited the natural rhythm and felicity of the language to reach new heights of simplicity and lyricism. An example of Ghalib’s wit can be seen in this translation (translation mine) of his ghazal:
You bring a rose to your face and say, like this.
Show me with my own lips how to lean for a kiss.
How to steal hearts without a word from your lips.
Each action of hers reeks with attitude like this.
When I suggested that her guests leave,
She asked me to get up and go, like this.
Do you feel that closeness brings an end to passion?
The waves in the sea still toss and turn, like this.
Those who say that the Persian ghazal is greater than Urdu,
Read them a selection of my verse, like this.
With time, however, the ghazal adopted new themes and imagery. It gave up the traditional rose, the moon and the Saaqi (the wine-bearer). Fervent religious reformers like Iqbal and romantic realists like Faiz entrenched it indelibly in the consciousness of the Indian sub-continent.
The Ghazal in English
The ghazal, thus, is full of great possibilities. It can be sung, it can move masses, and it can be a prayer or an ode or an elegy or a love-lyric or a call for revolution. Unfortunately, it has never fulfilled its promise in English. This may be due to the lack of awareness of its true structure, the lack of rhyming words in English, or the non-linear structure of the form itself, which requires a new mode of thinking. More likely, this is so because it has never been successfully adapted into English. The language has always risen to new challenges in the past and all that may be needed is to create an appreciation of the form among poets and critics.
Adrienne Rich and many others have written free verse ghazals. They have used a string of couplets in vers libre, usually more than four or five, and unrelated in content, as their criteria of ghazal. To me, this is equivalent to calling a fourteen-line poem a sonnet. While I do not contest a poet’s freedom to modernize and improvise, I feel that an attempt must be made to create the ghazal in its classical form, too. One should know the rules before deciding to break them.
The Mastery of the Craft
One must appreciate that the ghazal in some ways is diametrically opposite to free verse. The ghazal, as discussed earlier, while adhering to external form rigorously, leaves the emotion to leap from one couplet to another. It relies solely on unity of rhythm, the radeef, while free verse poems usually rely on unity of thought or image. An analogue to the ghazal may be the renga in its classical form with strict rules regarding syllable count, season words, etc., and a strictly non-narrative structure. The other kin to a ghazal may be sequence, though the sequence has no formal structure.
The first couplet in a ghazal provides the zemeen or basis on which all subsequent couplets stand. The theme of the following couplets may be unrelated, may contradict the previous one, may represent another perspective on the idea, and may even be part of a narrative (though this is less common). The second line in a couplet sometimes may even be unrelated to the first.
Often each couplet is an entirely different poem in itself, yoked to others only by reason of rhyme and rhythm. The strict limitation of form and length with stanzas of two lines only, each of which is an independent poem in itself places immense pressure on the poet. He must excel with each line. He has to touch the reader’s or listener’s intellect or emotions quickly and just as quickly move on. There is no time for expostulation.
The ghazal writer relies on pun, paradox, bathos and other literary devices or tarqeebs. Brevity is the key. An example of witty spiritual insouciance or romantic flirtation can be seen in this line from Ghalib and Faiz respectively (translations mine):
Is it ordained that each shall get the same reply?
Come, let us take a trip to Mount Sinai.
Love in the heart makes them upset;
On my lips, it becomes a secret.
The English Ghazal
To attempt an English metrical equivalent, one should perhaps limit oneself between five to twelve feet per couplet, like most English meters. Each line may include two hemistiches, though this is not essential. The two lines in a couplet may not have the same number of feet.
The earliest English poetry, to my understanding, was based on rhythm and not so much a metrical prosody. Urdu, being a relatively new language, does the same. The zemeen or basic rhythm is the key. Usually, each line is end-stopped and does not use, what Coleridge called, a feminine ending. Thus, a typical zemeen in Urdu may sound taut and simple as in this couplet:
That you were not aware,
We could hardly care.
Or it may be more spread out and complex:
Such pain that even wounds could not be witnesses;
At your arrival, there were no apocalypses.
(Above two examples translated from my ghazals in Urdu)
In place of rhyming the last word of each couplet, one may use a phrase as a refrain, as in Ghalib’s ghazal in the first section of this essay. Or one may use slant rhymes or incomplete rhymes and that would depend on the creativity of the poet. Or, one may use internal rhymes to bolster the refrain, e.g.,
Wounds of light have dared to flow
Since I moved closer to you.
Kiss them with the lips of sight,
The tongue of eyes whispers to you.
Lost in the stars you wake anew,
Mirrors at night are jewelers to you.
(Translated from my ghazals in Urdu)
All these rules, however, are only on the surface. The true measure of a ghazal is its saleeqah or the way a certain thing is said or not said, or left unsaid. Wit is highly prized along with nazuk-khayali or the subtlety of thought of feeling. An example of this fineness of perception can be seen in this couplet of Ghalib:
At each turn, you ask me who am I.
Tell me, is this the way to reply.
The ghazal then, to quote T. S. Eliot in another context, is a ‘precise way of thinking or feeling’. Trans-creating it into English may mean a new self-discipline and self-development. If the attempt succeeds, ‘a new wing to the opulent mansion of English poetry’ will be added and we shall have learnt something new in the process. Seeing the resourcefulness of the modern poets in English, I have no doubt that the English ghazal will soon become a native in this foreign soil and thrive in this land of immigrants.
(Parts of this essay published in ELF: Eclectic Literary Forum, 1997, Volume 7, Number Three and in SIRS, a resource publication for libraries in U.S. and Canada.)

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The Future of Indian Poetry

Dr. Pariksith Singh

Indian poetry in English is flat. There is no depth. This was my impression when I read some anthologies edited by Pritish Nandy few decades ago. This remains my impression after reviewing an anthology of more modern poets that I chanced upon recently. I came out with the feeling that I had read a newspaper. To be fair to Indian poets, much modern poetry is similar. Mental. Superficial. Sensational.
DH Lawrence had said that the best literature transforms your blood. My blood remains the same. The skin sags a bit more.
Save a few poems. A few poets.
Ezra Pound described poetry as comprised of three components: logopoeia, melopoiea and phanopoeia. Meaning, music and image. A very anatomic dissection reveals this as the sinews and muscle of poetry. But the best poetry accomplishes something else that is significant. It brings together an intense fusion of thought and feeling, of sensation and gut, intensity and subtlety, wideness and height and depth.
In the Indian context, the term ‘bhaava’ has been used, which implies a profounder feeling and thinking and sensing. TS Eliot while discussing metaphysical poets talks about a poetry where thoughts are felt. Bhaava implies such a fusion but it is yet more than a coming together of mind and heart. It means ‘to be’.
Great art absorbs one, drowns the reader or beholder. Technical perfection is one requirement, perhaps a basic one. But the identification of consciousness with the art opens it to new perspectives, insights, visions. Such new vistas in modern poetry are missing. As Steve Jobs complained, while discussing the products with his developers at Apple, ‘There is no sex in them.”
I am afraid that we have become TS Eliot in pyjamas if not ‘Mathew Arnold in a sari’. To turn this around, we will need to be bold and uncompromising.
A high fusion of content and craft, theme and style is what will distinguish excellence from mediocrity. Indian-English poetry does not seem to dare greatness. That might happen when Indian literature re-discovers or explores its own roots. As Tagore did.
What are these roots or myths? What are the conditions or the darshan? Or perhaps an even deeper question. Who are we? What is unique about us? This is journey we must make, no matter how excruciating or unfulfilling. To boldly sing in our own voice, steep ourselves in our svadharma, to draw in our own blood. To carry it as a woman carries her child in the womb. That is the only way we can deliver a new being, art with its own individuality.
To paraphrase McLeish, I would say, ‘Great poetry must not mean, but be.” In bhaava, in the dare, in the sva-darshana or self-seeing. Such is the future of our poetry if we may dare to hear and trace the notes of our own heart-beat. Shall we follow?

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The Musical Structure of Four Quartets

Dr. Pariksith Singh

The Four Quartets is a masterpiece. It is Eliot at his maturest, though perhaps not necessarily best with each line. The great achievement of this poem, if one may call it one poem, is its verse structure made to look or sound like a quartet. While it is impossible for a poem to sound like a quartet, Eliot has used different ‘instrumental voices’ in his ensemble to project a similar interplay of sounds.
In this essay, I have restricted myself to the versification in each quartet as opposed to the substance. Eliot has also very adroitly created an interaction of various themes and images to run parallel to his musical structure. But that is a subject that would invite another exposition beyond the parameters of this essay.
What is a quartet? Webster’s Third New International Dictionary defines it as a musical composition or movement in four parts each performed by a single voice or instrument. Usually, a quartet comprises of two violins along with a viola and a cello. The violins touch the highest frequencies of sound, the cello the lowest, while the viola employs the middle range of frequencies. Usually, the instruments play at the same time though one instrument may dominate at one time or another. It is important to understand the musical composition of a quartet to better appreciate what Eliot accomplished as a poet.
The only way Eliot could create another voice poetically was by employing a different line-length and verse-form to represent each different instrument. He used blank verse and lyrical structures, narrative and dramatic forms, at times resorting to Dantesque terza rima, at times breaking into Chaucerian diction. He broke each quartet into different segments, varying the sound-texture of each segment. Some of the segments could stand as separate lyrics of their own. Some are more like verse essays, where he thought slowly, deliberately.
Throughout Eliot has retained a classical approach—just as one would expect a quartet to be— though at times he breaks off into free verse. He does not try to split the page into two vertical poems running parallel to another, like Mallarme did—an experiment which failed, incidentally, even in Mallarme’s masterly hands.
If we take ‘Burnt Norton’, for instance, the meditation in the beginning of the poem is a hidden iambic pentameter:
Time present and time past
Are both perhaps present in time future,
And time future contained in time past.
If all time is eternally present
All time is unredeemable.
The second segment begins with an intricate and dense versification, that is lyrical, rhymed and in tetrameter.
Garlic and sapphires in the mud
Clot the bedded axle-tree.
The trilling wire in the blood
Sings below inveterate scars
Appeasing long forgotten wars.
He then employs the famous Upanishadic line ‘at the still point of the moving world’ in a heptametric section that, to me, is the epitome of meditative poetry:
At the still point of the turning world. Neither flesh nor fleshless;
Neither from nor towards; at the still point, there the dance is,
But neither arrest nor movement. And do not call it fixity,
Where past and future are gathered. Neither movement from nor towards…
He then moves again to pentameter, continuing the meditation, yet changing the color of the sound:
Erhebung without motion, concentration
Without elimination, both a new world
And the old made explicit, understood…
He begins the third segment switching back and forth between tetrametric and pentametric lines, then startlingly moves to a trochaic line that is a heptameter:
…Time before and time after,
Eructation of unhealthy souls
Into the faded air, the torpid
Driven on the wind that sweeps the gloomy hills of London…
He reverts to a pentametric line immediately after and again alternates between four and five syllables in each line.
The fourth segment is short, the first five lines lyrical and rhymed:
Time and the bell have buried the day,
The black cloud carries the sun away.
Will the sunflower turn to us, will the clematis
Stray down, bend to us; tendril and spray
Clutch and cling?
The next five lines vary in length with each line, still rhymed, lyrical and involved, the first line only a word, like a note floating in air.
Chill
Fingers of yew be curled
Down on us? After the kingfisher’s wing
Has answered light to light, and is silent, the light is still
At the still point of the turning world.
The fifth segment begins with a tetrametric tone, slow and deliberate, bringing to a synthesis the various voices that played through the entire piece. However, he quickly moves to the pentameter with the next line:
Words move, music moves
Only in time; but that which is only living
Can only die. Words, after speech, reach…
He again alternates between four and five syllables to each line and ends the poem with a burst of tetrameter:
Sudden in a shaft of sunlight
Even while the dust moves
There rises the hidden laughter
Of children in the foliage
Quick now, here, now, always—
Ridiculous the waste sad time
Stretching before and after.
The other three quartets employ a similar—though not same—interaction of voices, each comprising of five segments. Each quartet has a distinct flavor to it, and together, all four reach another new synthesis in musical composition.
The Four Quartets are truly Eliot’s magnum opus. He attempted to create a new interaction of verse forms and tones in his work like a quartet and succeeded brilliantly. His quartets are not quartets musically speaking but are more in the nature of verse artifacts, curiosities, something truly novel and a remarkable addition to the vast repository of English poetry.

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Neither-Nor

Dr. Pariksith Singh

Recently, I was invited to Pondicherry Literary Festival, held August 17-19 last month. This came as a surprise request from a well-known critic and poet, Makarand Paranjape. We had renewed our acquaintance just a couple of days prior to this request. I had sent him a booklet of my poems, ‘The Fawn’, in 1991 to which he had responded in a kind but critical manner. And I always remembered and appreciated that. While he was visiting the US recently, a mutual acquaintance got us connected. This chance invitation started a sequence of events that amazed, amused, perplexed and annoyed me.
I accepted the invite after some hesitation since it came just a couple of weeks prior to the LitFest and we had little time. But I agreed to join the Festival since it seemed too fortuitous to me at that time. I would have the opportunity to visit Pondicherry, a city I have visited since I was in Medical School, and that too on August 15, which is the birthday of Sri Aurobindo, for whom as a revolutionary, writer, poet and visionary I have utmost respect. It was the time I was planning to release three books of mine, two on poetry and one on Health Care in the US. So, I thought, the event might help give the books some publicity. I had no idea about the political storm that was brewing.
While I was in Newark airport, getting ready to board the flight to New Delhi, I came upon a press event held in Pondicherry by a few leftist organizations that opposed the festival. They referenced the article from Le Monde, a newspaper in France that mentioned my name and called me a rightist and therefore opposed the LitFest since it was an event organized by rightist forces. I was surprised since I had not known yet that I belonged to the right-wing. I pulled the article that Le Monde had referenced and found that it was something that I had sent to several media outlets more than a year ago. It was an article that cautioned Modi against concentrating all the power in the Prime Minister Office since it could have harmful and unforeseen consequences. Rightlog chose to publish it. Nowhere in the article was there blind worshipping of Modi, nor did I support him whole-heartedly. I praised him for what I thought were his achievements and brought up my reservations where they were due.
I was tagged as a rightist since Rightlog published it. The content of the article had no meaning. I doubt that the Le Monde correspondent read it. Nor was there any attempt to ascertain my views on Modi, the LitFest or even what I thought about the liberal-conservative divide in the US or the Congress-BJP battle in India. It was sloppy journalism at its worst but the leftist parties in Pondicherry picked it up and petitioned Alliance Francaise to stop supporting the event.
By the time, I reached Pondicherry the little turbulence had gathered into a hurricane. Alliance Francaise dropped out at the last moment from allowing the organizers to use its venue to stage the event. They had to hustle to find alternative sites. On the morning of the inauguration, a group of miscreants gathered at Alliance Francaise to protest against the event. Fortunately, the event had already been moved to another site by that time.
I came to hear some of the best speakers, writers and thinkers of India at the event some of them can easily represent India internationally. We had Bibek Debroy, Sanjiv Sanyal, R Jagannathan, Alok Pandey and Makarand Paranjape among many others. I did not realize that the event had been tagged, labeled, and consigned to oblivion by the Left because it invoked Sri Aurobindo and Bharat Shakti, because the leftist writers and thinkers had chosen not to attend it even though they had been invited, because some of the organizers had been labeled already as rightists. The event was not attended by mainstream media. No coverage was given to stalwarts such as Bibek Debroy and others in the newspapers. My own father who was travelling with us tagged an exhibition on Indian Civilization and Spirituality as rightist because there was no Gandhi in it. That is when I received a vital insight.
I realized that the atmosphere in our country over the last 20 years had moved to an extreme divisiveness where raw emotion and sensationalism had taken over journalism and reason had fled our shores. And it was similar to what I had experienced in the US over the last decade or so. In any case, I visited Sri Aurobindo’s room and paid my respect. I sat at his Samadhi without a single thought or reaction over how vitiated our social discourse had become. I was just grateful that I could sit there on August 15 and release my books.
We came to Jaipur and my father arranged a press event, where, thankfully, all his journalist-friends whom he had known over the last 30 years came. I was questioned in a professional manner. I was interviewed for various TV channels and I did a poetry reading of my English and Hindi poems. Then came the question I had not expected in that more friendly atmosphere. “Are you a rightist and are your poems affiliated with a particular political party?”
And as I answered, I got my second insight. I said that the division between the right and left to me sometimes seemed artificial. I am a doctor who chose this profession because I wanted to help and heal. Does that make me a leftist? And I believe in free enterprise? Does that make me a rightist? And if caring for people, advocating health insurance for everyone, having empathy for the downtrodden and the poor and the weak made me a socialist I was proud to be one. And if supporting enterprise and businesses and individual freedom made me a conservative, I would be happy to hold that flag any day. Then I quoted something I had heard recently, “A bird needs two wings to fly, both the right and the left. So does our country.”
And I was done. And I had just begun.
When did loving one’s country became the right of one side or the other? I refused to accept the tag. I rejected them with all my passion and my being.
When did Swami Vivekananda become a rightist? He who loved the oppressed and forgotten and wanted to worship ‘Daridra Narayana’, the Divine who lives in the poorest and the most miserable, and had the deepest empathy for anyone who was suffering?
I am a leftist and a rightist. I am a green party member and I am libertarian. I refuse to allow others to pin me to who I am and who I choose to be and who I am allowed to be. I escape all categories and eschew all classification.
Truth is neither left nor right; Truth is the center. The only true one.
How shall I be pinned? I am invisible. I defy classification.
And I am reminded of Walt Whitman as I say this:
“You say I contradict myself.
Very well then, I contradict myself.
I contain multitudes.”

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Sri Aurobindo, the Challenge of a Poet

Dr. Pariksith Singh

Of all the poets over the last few centuries, Sri Aurobindo presents the most unique challenge to the reader. He is not difficult with contorted meanings like Celan or surrealist like Lorca or complex like TS Eliot. These others can still be fathomed if one spends enough time with them; they can be extremely dense, sometimes cryptic to the max, yet, the challenge is in meaning or import.
But Sri Aurobindo needs a new experience and consciousness to understand. In this, he is akin to the ancient Vedic rishis who composed the Vedas and Upanishads. An entirely new range of discernment and awareness is needed. Sri Aurobindo challenges one’s DNA as it were.
Modern poetry has been extremely severe, almost savage, in its criticism of his poetry, though his prose seems relatively well-placed now. The question is is there anything of value in his poetry and, if there is, does it need to be discovered on terms set by him?
To my mind, Sri Aurobindo is exploring the consciousness inherent in sound, among other things. In his best poems and lines, we see a sound-significance that is transformative. He is a poet of sound and the consciousness of sound. When we read passages in Savitri such as ‘The Adoration of the Divine Mother’ or sonnets such as ‘Nirvana’, we find the spiritual experience clearly described verbally but, on closer attention, the experience is created with the sound of the incantation and the harmonies created by a remarkable choice of words. In this, his aim to catch the Upanishadic element in English verse seems to have been realized.
We also see in his poetry the fusion of abstract with concrete, what to us is barely perceived or perceivable is described clearly by him with precise details. This is confusing and vague to the uninformed mind and creates a reaction in the modern mind. But in his best poems, he has found what we might call ‘the subjective correlative’ to paraphrase Eliot.
It is the misfortune of Indian poetry that Sri Aurobindo’s classicism was a mismatch in the age of Eliot and Pound. A lot of bad verse has been written in imitation of the modernist poets in the 20th century and the achievements made by Sri Aurobindo in verse were seldom realized. His experimentations with form poems and new rhythms in English are quite remarkable and sometimes extremely successful, e.g., ‘The Image’ written in quantitative hexameter or the sapphics in his poem ‘The Descent’.
Fame and fortune of a poet are no reflection of his or her excellence. It is my surmise that Sri Aurobindo’s greatness and achievements as a poet shall be duly recognized by Indian critics and critics around the world once they separate their instinctive dislike of his classicism and read him with a more discerning eye and ear.
We have far lesser poets who are well-known and studied with less than half a dozen good poems to their credit. Sri Aurobindo has many more, not only as a poet but also as a poet-translator of Upanishadic and Vedic shlokas.

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