Kailash Manhar

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सुप्रसिद्ध कवि कैलाश मनहर का जन्म 2 अप्रेल, 1954 को राजस्थान के मनोहरपुर में हुआ। जहाँ न पहुँचे रवि,वहाँ पहुँचे कवि की उक्ति को चरितार्थ करते हुए कैलाश मनहर ने अपनी कवितों के माध्यम से जीवन के हर पहलू का सूक्ष्म अंवेषण किया है। समयानुसार काव्य रचनाओं के विराट सृजन में अनेक महत्वपूर्ण व प्रासंगिक विषय उनकी काव्यधर्मिता से जुड़ते चले गए किंतु आम आदमी और उनसे जुड़े सरोकार उनकी कविताओं में सदैव प्रतिपाद्य विषय रहे। कैलाश मनहर की कविताओं में शब्द स्थितिनुसार नि:सृत होते हैं जिन्हें पढ़ते समय लगता है जैसे कविता के आँचल में कोई घटना अपनी परिणति तक पहुँचने की कथा सुना रही हो। कैलाश मनहर की यही क़िस्सागोई पाठकों के औत्सुक्य को प्रबल करती है कि देखें, आगे क्या है....। शब्दाडंबरों से परे कैलाश मनहर की यही सहजता और सरलता उन्हें पाठकों से जोड़ने में सेतु का काम करती है क्योंकि कविता तो जल की भाँति होती है, जितनी निर्मल...उतनी ही ग्राह्य। कैलाश मनहर के काव्य-लेखन में अनेक मील के पत्थर हैं जिनमें- उदास आँखों में उम्मीद(2013), अवसाद-पक्ष(2010), सूखी नदी(2006), कविता की सहयात्रा में(1986), कविता संग्रह के अतिरिक्त, कुछ अन्य प्रतिनिधि रचनाएं जैसे- नमक की बात न करें, पुराना शहर, मैं कोई कविता लिख रहा हूँगा तथा रात का हाल मुझ से पूछ आदि शामिल हैं। कैलाश मनहर इसके अलावा एक ग़ज़लकार तो हैं ही, वे बाल-गीत और नाटक भी लिखते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी कैलाश मनहर के कुछ वैचारिक लेख व संस्मरणात्मक रेखाचित्रों ने भी पाठकों पर अपनी गहरी छाप छोड़ी है।

भरपूर मनुष्य की तरह

Kailash Manhar

ख़ुद से बना रहे मेरा लगाव
स्वाभिमान के साथ
जन से बना रहे जुड़ाव
ईमानदारी से और
बना रहे सच्चाई का भाव
पारदर्शियतायुक्त मन में
बनी रहे हिम्मत
अन्याय के विरुद्ध बोलने की
शोषण की पोल खोलने की
न्याय के पक्ष में रहने की
झूठ को तनिक भी नहीं सहने की
आदत बनी रहे शब्द पर विश्वास की
सार्थकतापूर्ण आस की
फिर क्या फर्क़ पड़ता है कि तुम
कवि मानो या न मानो मुझे
अथवा बना रहूँ या नहीं मैं स्वयं भी
क्या इतना-सा ही काफ़ी नहीं
कविता के लिये
कि जिसे कवि कहा जाये वह
एक भरपूर मनुष्य की तरह जिये

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चिन्ता-सी सुलगती है

Kailash Manhar

तापने के दिन अभी नहीं आये लेकिन
जलावन तो करनी है इकठ्ठी
कार्तिक की इस चिरपरी शरद में
आने वाली शीत लहर का अंदेशा तो है
हाड़ों को कांपने से बचाना तो है कि
गुड़ खरीद लिया जाये दसेक किलो और
लालड़ी गोंद टाबरों के लिये
घी का हो जाये इन्तज़ाम तो बहुत अच्छा
वर्ना तिल्ली का तैल तो हो पांचेक सेर
बाजरे की भी खरीदनी तो है एक बोरी क्योंकि
राशन का गेंहू तो पूरा नहीं पड़ता वैसे ही
त्यौहार पे त्यौहार और पड़ने हैं इन्हीं दिनों
दुनिया भर में होगी चकाचौंध
पाँच दीये तो हम भी जलायेंगे चौखट पर
मजूरी मिलती रहे लगातार राम करे
पलते रहें बाल-बच्चे निरापद
तापने के दिन हालांकि अभी नहीं आये
चिन्ता-सी सुलगती है मन में बिन सुलगाये

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यह समय

Kailash Manhar

यह सोचने का समय है
सोच सोच कर परेशान होने का समय है
सोचते हुये ऊबने का समय है
ऊबते हुये डूबने का समय है यह
किन्तु फर्क़ भी क्या पड़ता है इसमें कि
डूब रहा है जब सारा देश
जब सारा समाज डूब रहा है ऊबते हुये
सोचते हुये और परेशान होते हुये
जब कविता से बच रहा है प्रत्येक व्यक्ति
यह कविता रचने का समय है
कविता पढ़ने का समय है यह
कविता को गुनने का समय है

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शरद: कुछ काव्य-चित्र

Kailash Manhar

(एक)
कास के रेशमी फूलों को सहला रहा है
किशोर वय का सुकोमल हाथ
गूलर के पके हुये फलों को देख रही हैं
उफनते यौवन की रतनारी आँखें
(दो)
झील की सतह पर खिली है शुभ्र ज्योत्सना
तल में से झांक रहा है पूर्ण चन्द्र
तुम भी होते यदि साथ
यह रात हमारे लिये अविस्मरणीय होती प्रेम!
(तीन)
पीपल की डाल पर प्रेम मग्न पक्षी-युगल
हवायें सिहरा रहीं हैं तन-बदन
मन में कोई हूक-सी उठती है
बांध कर रख लूँ तुम्हें चाँदनी की डोर से
(चार)
केसर में नहाई है देह
कैर के फूलों का रंग लेपा है अधरों पर
कांटों में उलझा है आँचल
छुड़वा कर ले चलो साथ कहीं दूर मुझे
भोर का उजास होने के पहले ही
(पाँच)
शरद की चाँदनी में सीझ रही है
अँगीठी की धीमी आँच पर
गाय के दूध की सुमधुर खीर
बल बुध्दि वीर्य वर्धक
तुलसी-दल डाल दो तुम अपने हाथों से
(छह)
मोगरा महकता है सांसों में
हवायें बह रही हैं मलय-गंधी
स्वप्न-स्वप्न झरती है उत्कंठा
शरद में होना था दोनों को साथ-साथ
(सात)
कार्तिक-स्नान से लौट रही हैं स्त्रियाँ
मंदिर में गूंजने लगे आरती के स्वर
शरद के रंग में रंगा है ईश्वर भी
हरि यश में गाती है मिलन-गीत विरहिनी

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स्थगन

Kailash Manhar

इतनी सारी दुविधायें हैं जीवन में कि
सुविधा के लिये स्थान ही नहीं है कहीं
मरते हुये बच्चे पर नज़र गड़ाये बैठे गिध्द हैं
और कहीं एक हरिणी है
अपने छौने को बचाने के लिये
सुपुर्द करती बाघ के जबड़ों में अपनी देह
आह!
अख़लाक की चीखें गूँज रही हैं कानों में
और उस स्त्री का चेहरा जो
कड़ा कर के अपना मन कूद रही है
अथाह गहरे कूँए में
बिलख रहा है पाट पर बैठा दुधमुँहा बच्चा
और सरकार के लिये जरूरी है
शहरों का नाम बदलना
बचाओ!बचाओ!की चीत्कारें गूँज रही हैं
हर दिशा में बदहवास
दौड़ते लोग दिखाई देते हैं
सुनो!
कुछ दिन के लिये स्थगित रखो प्रेम
अभी ज़हर बहुत है हवाओं में

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भरपूर मनुष्य की तरह

Kailash Manhar

ख़ुद से बना रहे मेरा लगाव
स्वाभिमान के साथ
जन से बना रहे जुड़ाव
ईमानदारी से और
बना रहे सच्चाई का भाव
पारदर्शियतायुक्त मन में
बनी रहे हिम्मत
अन्याय के विरुद्ध बोलने की
शोषण की पोल खोलने की
न्याय के पक्ष में रहने की
झूठ को तनिक भी नहीं सहने की
आदत बनी रहे शब्द पर विश्वास की
सार्थकतापूर्ण आस की
फिर क्या फर्क़ पड़ता है कि तुम
कवि मानो या न मानो मुझे
अथवा बना रहूँ या नहीं मैं स्वयं भी
क्या इतना-सा ही काफ़ी नहीं
कविता के लिये
कि जिसे कवि कहा जाये वह
एक भरपूर मनुष्य की तरह जिये

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चिन्ता-सी सुलगती है

Kailash Manhar

तापने के दिन अभी नहीं आये लेकिन
जलावन तो करनी है इकठ्ठी
कार्तिक की इस चिरपरी शरद में
आने वाली शीत लहर का अंदेशा तो है
हाड़ों को कांपने से बचाना तो है कि
गुड़ खरीद लिया जाये दसेक किलो और
लालड़ी गोंद टाबरों के लिये
घी का हो जाये इन्तज़ाम तो बहुत अच्छा
वर्ना तिल्ली का तैल तो हो पांचेक सेर
बाजरे की भी खरीदनी तो है एक बोरी क्योंकि
राशन का गेंहू तो पूरा नहीं पड़ता वैसे ही
त्यौहार पे त्यौहार और पड़ने हैं इन्हीं दिनों
दुनिया भर में होगी चकाचौंध
पाँच दीये तो हम भी जलायेंगे चौखट पर
मजूरी मिलती रहे लगातार राम करे
पलते रहें बाल-बच्चे निरापद
तापने के दिन हालांकि अभी नहीं आये
चिन्ता-सी सुलगती है मन में बिन सुलगाये

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यह समय

Kailash Manhar

यह सोचने का समय है
सोच सोच कर परेशान होने का समय है
सोचते हुये ऊबने का समय है
ऊबते हुये डूबने का समय है यह
किन्तु फर्क़ भी क्या पड़ता है इसमें कि
डूब रहा है जब सारा देश
जब सारा समाज डूब रहा है ऊबते हुये
सोचते हुये और परेशान होते हुये
जब कविता से बच रहा है प्रत्येक व्यक्ति
यह कविता रचने का समय है
कविता पढ़ने का समय है यह
कविता को गुनने का समय है

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शरद: कुछ काव्य-चित्र

Kailash Manhar

(एक)
कास के रेशमी फूलों को सहला रहा है
किशोर वय का सुकोमल हाथ
गूलर के पके हुये फलों को देख रही हैं
उफनते यौवन की रतनारी आँखें
(दो)
झील की सतह पर खिली है शुभ्र ज्योत्सना
तल में से झांक रहा है पूर्ण चन्द्र
तुम भी होते यदि साथ
यह रात हमारे लिये अविस्मरणीय होती प्रेम!
(तीन)
पीपल की डाल पर प्रेम मग्न पक्षी-युगल
हवायें सिहरा रहीं हैं तन-बदन
मन में कोई हूक-सी उठती है
बांध कर रख लूँ तुम्हें चाँदनी की डोर से
(चार)
केसर में नहाई है देह
कैर के फूलों का रंग लेपा है अधरों पर
कांटों में उलझा है आँचल
छुड़वा कर ले चलो साथ कहीं दूर मुझे
भोर का उजास होने के पहले ही
(पाँच)
शरद की चाँदनी में सीझ रही है
अँगीठी की धीमी आँच पर
गाय के दूध की सुमधुर खीर
बल बुध्दि वीर्य वर्धक
तुलसी-दल डाल दो तुम अपने हाथों से
(छह)
मोगरा महकता है सांसों में
हवायें बह रही हैं मलय-गंधी
स्वप्न-स्वप्न झरती है उत्कंठा
शरद में होना था दोनों को साथ-साथ
(सात)
कार्तिक-स्नान से लौट रही हैं स्त्रियाँ
मंदिर में गूंजने लगे आरती के स्वर
शरद के रंग में रंगा है ईश्वर भी
हरि यश में गाती है मिलन-गीत विरहिनी

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स्थगन

Kailash Manhar

इतनी सारी दुविधायें हैं जीवन में कि
सुविधा के लिये स्थान ही नहीं है कहीं
मरते हुये बच्चे पर नज़र गड़ाये बैठे गिध्द हैं
और कहीं एक हरिणी है
अपने छौने को बचाने के लिये
सुपुर्द करती बाघ के जबड़ों में अपनी देह
आह!
अख़लाक की चीखें गूँज रही हैं कानों में
और उस स्त्री का चेहरा जो
कड़ा कर के अपना मन कूद रही है
अथाह गहरे कूँए में
बिलख रहा है पाट पर बैठा दुधमुँहा बच्चा
और सरकार के लिये जरूरी है
शहरों का नाम बदलना
बचाओ!बचाओ!की चीत्कारें गूँज रही हैं
हर दिशा में बदहवास
दौड़ते लोग दिखाई देते हैं
सुनो!
कुछ दिन के लिये स्थगित रखो प्रेम
अभी ज़हर बहुत है हवाओं में

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भरपूर मनुष्य की तरह

Kailash Manhar

ख़ुद से बना रहे मेरा लगाव
स्वाभिमान के साथ
जन से बना रहे जुड़ाव
ईमानदारी से और
बना रहे सच्चाई का भाव
पारदर्शियतायुक्त मन में
बनी रहे हिम्मत
अन्याय के विरुद्ध बोलने की
शोषण की पोल खोलने की
न्याय के पक्ष में रहने की
झूठ को तनिक भी नहीं सहने की
आदत बनी रहे शब्द पर विश्वास की
सार्थकतापूर्ण आस की
फिर क्या फर्क़ पड़ता है कि तुम
कवि मानो या न मानो मुझे
अथवा बना रहूँ या नहीं मैं स्वयं भी
क्या इतना-सा ही काफ़ी नहीं
कविता के लिये
कि जिसे कवि कहा जाये वह
एक भरपूर मनुष्य की तरह जिये

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चिन्ता-सी सुलगती है

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तापने के दिन अभी नहीं आये लेकिन
जलावन तो करनी है इकठ्ठी
कार्तिक की इस चिरपरी शरद में
आने वाली शीत लहर का अंदेशा तो है
हाड़ों को कांपने से बचाना तो है कि
गुड़ खरीद लिया जाये दसेक किलो और
लालड़ी गोंद टाबरों के लिये
घी का हो जाये इन्तज़ाम तो बहुत अच्छा
वर्ना तिल्ली का तैल तो हो पांचेक सेर
बाजरे की भी खरीदनी तो है एक बोरी क्योंकि
राशन का गेंहू तो पूरा नहीं पड़ता वैसे ही
त्यौहार पे त्यौहार और पड़ने हैं इन्हीं दिनों
दुनिया भर में होगी चकाचौंध
पाँच दीये तो हम भी जलायेंगे चौखट पर
मजूरी मिलती रहे लगातार राम करे
पलते रहें बाल-बच्चे निरापद
तापने के दिन हालांकि अभी नहीं आये
चिन्ता-सी सुलगती है मन में बिन सुलगाये

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यह समय

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यह सोचने का समय है
सोच सोच कर परेशान होने का समय है
सोचते हुये ऊबने का समय है
ऊबते हुये डूबने का समय है यह
किन्तु फर्क़ भी क्या पड़ता है इसमें कि
डूब रहा है जब सारा देश
जब सारा समाज डूब रहा है ऊबते हुये
सोचते हुये और परेशान होते हुये
जब कविता से बच रहा है प्रत्येक व्यक्ति
यह कविता रचने का समय है
कविता पढ़ने का समय है यह
कविता को गुनने का समय है

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शरद: कुछ काव्य-चित्र

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(एक)
कास के रेशमी फूलों को सहला रहा है
किशोर वय का सुकोमल हाथ
गूलर के पके हुये फलों को देख रही हैं
उफनते यौवन की रतनारी आँखें
(दो)
झील की सतह पर खिली है शुभ्र ज्योत्सना
तल में से झांक रहा है पूर्ण चन्द्र
तुम भी होते यदि साथ
यह रात हमारे लिये अविस्मरणीय होती प्रेम!
(तीन)
पीपल की डाल पर प्रेम मग्न पक्षी-युगल
हवायें सिहरा रहीं हैं तन-बदन
मन में कोई हूक-सी उठती है
बांध कर रख लूँ तुम्हें चाँदनी की डोर से
(चार)
केसर में नहाई है देह
कैर के फूलों का रंग लेपा है अधरों पर
कांटों में उलझा है आँचल
छुड़वा कर ले चलो साथ कहीं दूर मुझे
भोर का उजास होने के पहले ही
(पाँच)
शरद की चाँदनी में सीझ रही है
अँगीठी की धीमी आँच पर
गाय के दूध की सुमधुर खीर
बल बुध्दि वीर्य वर्धक
तुलसी-दल डाल दो तुम अपने हाथों से
(छह)
मोगरा महकता है सांसों में
हवायें बह रही हैं मलय-गंधी
स्वप्न-स्वप्न झरती है उत्कंठा
शरद में होना था दोनों को साथ-साथ
(सात)
कार्तिक-स्नान से लौट रही हैं स्त्रियाँ
मंदिर में गूंजने लगे आरती के स्वर
शरद के रंग में रंगा है ईश्वर भी
हरि यश में गाती है मिलन-गीत विरहिनी

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स्थगन

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इतनी सारी दुविधायें हैं जीवन में कि
सुविधा के लिये स्थान ही नहीं है कहीं
मरते हुये बच्चे पर नज़र गड़ाये बैठे गिध्द हैं
और कहीं एक हरिणी है
अपने छौने को बचाने के लिये
सुपुर्द करती बाघ के जबड़ों में अपनी देह
आह!
अख़लाक की चीखें गूँज रही हैं कानों में
और उस स्त्री का चेहरा जो
कड़ा कर के अपना मन कूद रही है
अथाह गहरे कूँए में
बिलख रहा है पाट पर बैठा दुधमुँहा बच्चा
और सरकार के लिये जरूरी है
शहरों का नाम बदलना
बचाओ!बचाओ!की चीत्कारें गूँज रही हैं
हर दिशा में बदहवास
दौड़ते लोग दिखाई देते हैं
सुनो!
कुछ दिन के लिये स्थगित रखो प्रेम
अभी ज़हर बहुत है हवाओं में

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भरपूर मनुष्य की तरह

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ख़ुद से बना रहे मेरा लगाव
स्वाभिमान के साथ
जन से बना रहे जुड़ाव
ईमानदारी से और
बना रहे सच्चाई का भाव
पारदर्शियतायुक्त मन में
बनी रहे हिम्मत
अन्याय के विरुद्ध बोलने की
शोषण की पोल खोलने की
न्याय के पक्ष में रहने की
झूठ को तनिक भी नहीं सहने की
आदत बनी रहे शब्द पर विश्वास की
सार्थकतापूर्ण आस की
फिर क्या फर्क़ पड़ता है कि तुम
कवि मानो या न मानो मुझे
अथवा बना रहूँ या नहीं मैं स्वयं भी
क्या इतना-सा ही काफ़ी नहीं
कविता के लिये
कि जिसे कवि कहा जाये वह
एक भरपूर मनुष्य की तरह जिये

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चिन्ता-सी सुलगती है

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तापने के दिन अभी नहीं आये लेकिन
जलावन तो करनी है इकठ्ठी
कार्तिक की इस चिरपरी शरद में
आने वाली शीत लहर का अंदेशा तो है
हाड़ों को कांपने से बचाना तो है कि
गुड़ खरीद लिया जाये दसेक किलो और
लालड़ी गोंद टाबरों के लिये
घी का हो जाये इन्तज़ाम तो बहुत अच्छा
वर्ना तिल्ली का तैल तो हो पांचेक सेर
बाजरे की भी खरीदनी तो है एक बोरी क्योंकि
राशन का गेंहू तो पूरा नहीं पड़ता वैसे ही
त्यौहार पे त्यौहार और पड़ने हैं इन्हीं दिनों
दुनिया भर में होगी चकाचौंध
पाँच दीये तो हम भी जलायेंगे चौखट पर
मजूरी मिलती रहे लगातार राम करे
पलते रहें बाल-बच्चे निरापद
तापने के दिन हालांकि अभी नहीं आये
चिन्ता-सी सुलगती है मन में बिन सुलगाये

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यह समय

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यह सोचने का समय है
सोच सोच कर परेशान होने का समय है
सोचते हुये ऊबने का समय है
ऊबते हुये डूबने का समय है यह
किन्तु फर्क़ भी क्या पड़ता है इसमें कि
डूब रहा है जब सारा देश
जब सारा समाज डूब रहा है ऊबते हुये
सोचते हुये और परेशान होते हुये
जब कविता से बच रहा है प्रत्येक व्यक्ति
यह कविता रचने का समय है
कविता पढ़ने का समय है यह
कविता को गुनने का समय है

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शरद: कुछ काव्य-चित्र

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(एक)
कास के रेशमी फूलों को सहला रहा है
किशोर वय का सुकोमल हाथ
गूलर के पके हुये फलों को देख रही हैं
उफनते यौवन की रतनारी आँखें
(दो)
झील की सतह पर खिली है शुभ्र ज्योत्सना
तल में से झांक रहा है पूर्ण चन्द्र
तुम भी होते यदि साथ
यह रात हमारे लिये अविस्मरणीय होती प्रेम!
(तीन)
पीपल की डाल पर प्रेम मग्न पक्षी-युगल
हवायें सिहरा रहीं हैं तन-बदन
मन में कोई हूक-सी उठती है
बांध कर रख लूँ तुम्हें चाँदनी की डोर से
(चार)
केसर में नहाई है देह
कैर के फूलों का रंग लेपा है अधरों पर
कांटों में उलझा है आँचल
छुड़वा कर ले चलो साथ कहीं दूर मुझे
भोर का उजास होने के पहले ही
(पाँच)
शरद की चाँदनी में सीझ रही है
अँगीठी की धीमी आँच पर
गाय के दूध की सुमधुर खीर
बल बुध्दि वीर्य वर्धक
तुलसी-दल डाल दो तुम अपने हाथों से
(छह)
मोगरा महकता है सांसों में
हवायें बह रही हैं मलय-गंधी
स्वप्न-स्वप्न झरती है उत्कंठा
शरद में होना था दोनों को साथ-साथ
(सात)
कार्तिक-स्नान से लौट रही हैं स्त्रियाँ
मंदिर में गूंजने लगे आरती के स्वर
शरद के रंग में रंगा है ईश्वर भी
हरि यश में गाती है मिलन-गीत विरहिनी

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इतनी सारी दुविधायें हैं जीवन में कि
सुविधा के लिये स्थान ही नहीं है कहीं
मरते हुये बच्चे पर नज़र गड़ाये बैठे गिध्द हैं
और कहीं एक हरिणी है
अपने छौने को बचाने के लिये
सुपुर्द करती बाघ के जबड़ों में अपनी देह
आह!
अख़लाक की चीखें गूँज रही हैं कानों में
और उस स्त्री का चेहरा जो
कड़ा कर के अपना मन कूद रही है
अथाह गहरे कूँए में
बिलख रहा है पाट पर बैठा दुधमुँहा बच्चा
और सरकार के लिये जरूरी है
शहरों का नाम बदलना
बचाओ!बचाओ!की चीत्कारें गूँज रही हैं
हर दिशा में बदहवास
दौड़ते लोग दिखाई देते हैं
सुनो!
कुछ दिन के लिये स्थगित रखो प्रेम
अभी ज़हर बहुत है हवाओं में

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भरपूर मनुष्य की तरह

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ख़ुद से बना रहे मेरा लगाव
स्वाभिमान के साथ
जन से बना रहे जुड़ाव
ईमानदारी से और
बना रहे सच्चाई का भाव
पारदर्शियतायुक्त मन में
बनी रहे हिम्मत
अन्याय के विरुद्ध बोलने की
शोषण की पोल खोलने की
न्याय के पक्ष में रहने की
झूठ को तनिक भी नहीं सहने की
आदत बनी रहे शब्द पर विश्वास की
सार्थकतापूर्ण आस की
फिर क्या फर्क़ पड़ता है कि तुम
कवि मानो या न मानो मुझे
अथवा बना रहूँ या नहीं मैं स्वयं भी
क्या इतना-सा ही काफ़ी नहीं
कविता के लिये
कि जिसे कवि कहा जाये वह
एक भरपूर मनुष्य की तरह जिये

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चिन्ता-सी सुलगती है

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तापने के दिन अभी नहीं आये लेकिन
जलावन तो करनी है इकठ्ठी
कार्तिक की इस चिरपरी शरद में
आने वाली शीत लहर का अंदेशा तो है
हाड़ों को कांपने से बचाना तो है कि
गुड़ खरीद लिया जाये दसेक किलो और
लालड़ी गोंद टाबरों के लिये
घी का हो जाये इन्तज़ाम तो बहुत अच्छा
वर्ना तिल्ली का तैल तो हो पांचेक सेर
बाजरे की भी खरीदनी तो है एक बोरी क्योंकि
राशन का गेंहू तो पूरा नहीं पड़ता वैसे ही
त्यौहार पे त्यौहार और पड़ने हैं इन्हीं दिनों
दुनिया भर में होगी चकाचौंध
पाँच दीये तो हम भी जलायेंगे चौखट पर
मजूरी मिलती रहे लगातार राम करे
पलते रहें बाल-बच्चे निरापद
तापने के दिन हालांकि अभी नहीं आये
चिन्ता-सी सुलगती है मन में बिन सुलगाये

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यह समय

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यह सोचने का समय है
सोच सोच कर परेशान होने का समय है
सोचते हुये ऊबने का समय है
ऊबते हुये डूबने का समय है यह
किन्तु फर्क़ भी क्या पड़ता है इसमें कि
डूब रहा है जब सारा देश
जब सारा समाज डूब रहा है ऊबते हुये
सोचते हुये और परेशान होते हुये
जब कविता से बच रहा है प्रत्येक व्यक्ति
यह कविता रचने का समय है
कविता पढ़ने का समय है यह
कविता को गुनने का समय है

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शरद: कुछ काव्य-चित्र

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(एक)
कास के रेशमी फूलों को सहला रहा है
किशोर वय का सुकोमल हाथ
गूलर के पके हुये फलों को देख रही हैं
उफनते यौवन की रतनारी आँखें
(दो)
झील की सतह पर खिली है शुभ्र ज्योत्सना
तल में से झांक रहा है पूर्ण चन्द्र
तुम भी होते यदि साथ
यह रात हमारे लिये अविस्मरणीय होती प्रेम!
(तीन)
पीपल की डाल पर प्रेम मग्न पक्षी-युगल
हवायें सिहरा रहीं हैं तन-बदन
मन में कोई हूक-सी उठती है
बांध कर रख लूँ तुम्हें चाँदनी की डोर से
(चार)
केसर में नहाई है देह
कैर के फूलों का रंग लेपा है अधरों पर
कांटों में उलझा है आँचल
छुड़वा कर ले चलो साथ कहीं दूर मुझे
भोर का उजास होने के पहले ही
(पाँच)
शरद की चाँदनी में सीझ रही है
अँगीठी की धीमी आँच पर
गाय के दूध की सुमधुर खीर
बल बुध्दि वीर्य वर्धक
तुलसी-दल डाल दो तुम अपने हाथों से
(छह)
मोगरा महकता है सांसों में
हवायें बह रही हैं मलय-गंधी
स्वप्न-स्वप्न झरती है उत्कंठा
शरद में होना था दोनों को साथ-साथ
(सात)
कार्तिक-स्नान से लौट रही हैं स्त्रियाँ
मंदिर में गूंजने लगे आरती के स्वर
शरद के रंग में रंगा है ईश्वर भी
हरि यश में गाती है मिलन-गीत विरहिनी

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स्थगन

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इतनी सारी दुविधायें हैं जीवन में कि
सुविधा के लिये स्थान ही नहीं है कहीं
मरते हुये बच्चे पर नज़र गड़ाये बैठे गिध्द हैं
और कहीं एक हरिणी है
अपने छौने को बचाने के लिये
सुपुर्द करती बाघ के जबड़ों में अपनी देह
आह!
अख़लाक की चीखें गूँज रही हैं कानों में
और उस स्त्री का चेहरा जो
कड़ा कर के अपना मन कूद रही है
अथाह गहरे कूँए में
बिलख रहा है पाट पर बैठा दुधमुँहा बच्चा
और सरकार के लिये जरूरी है
शहरों का नाम बदलना
बचाओ!बचाओ!की चीत्कारें गूँज रही हैं
हर दिशा में बदहवास
दौड़ते लोग दिखाई देते हैं
सुनो!
कुछ दिन के लिये स्थगित रखो प्रेम
अभी ज़हर बहुत है हवाओं में

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