Dr. Omendra Ratnu

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Dr Omendra Ratnu is a Jaipur based ENT surgeon who runs his own hospital. Survival and blossoming of Hindi Bhasha by enhancing its use and promoting Hindi literature are one of his core passions. He has been writing poetry and articles in various newspapers and web portals of Bharat. He runs an NGO by the title of Nimittekam, with the main purpose of helping displaced Hindu refugees from Pakistan and integrating Dalit Sahodaras into Hindu mainstream. Issues of the survival of Sanatana Dharma are also one of his core concerns for which he roams around the world to raise funds and awareness. He is also a singer, composer, Geeta communicator, and a ground activist for Hindu causes. He has released a Bhajan album and a Ghazal album composed and sung by him.

ये कौन आह जगी

Dr. Omendra Ratnu

मन के अनुसंधान समझ, शब्दों के परिधान पहन...ये कौन आह जगी ?
शीतलता से उत्तप्त, सभी स्मृतियों से विगत, क्षितिज पे जागती जोत सी ....ये कौन आह जगी ?
बोध के वर्तुल से मुक्त, मात्र चैतन्य से युक्त, जलाती उष्णता में हल्की बयार सी.... ये कौन आह जगी ?
स्वत्व को विस्तीर्ण करती, अहम् जीर्ण जीर्ण करती, माँ की फटकार सी ....ये कौन आह जगी ?
स्थित अपनी नग्नता में, निश्चिन्त अपनी मग्नता में , शिशु की किलकार सी...ये कौन आह जगी ?

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महाशून्य के साथ

Dr. Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री! कन्या, भोली, कुंवारी!
हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़!
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई,
अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़!
रूप, गंध, स्पर्श, शब्द से विरस होकर, अरूप, निशब्द, अस्पर्शित, निर्धूम से नाता जोड़!
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ?
अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़!
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती,
प्रेम और करुणा के संग साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी !

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अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे

Dr. Omendra Ratnu

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह,
नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्ज़ी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !

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तू अब भी है

Dr. Omendra Ratnu

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें,
वजूद में मेरे घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तन्हाईयों में मगर , तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से अब फ़र्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनून में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है

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मन के मयूरा

Dr. Omendra Ratnu

नाच ओ मन के मयूरा नाच !
चेतना के ज्वार पे चढ़ ,
महालय के स्वाद को चख ,
निस्तब्धता के घुंघरुओं को जांच ,
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
काल वर्णी मेघ छाए,
मित्रता के हाथ आए ,
साँच को आती नहीं है आँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
माया पाश क्षीण पड़े ,
सुर नए विस्तीर्ण गढ़े,
कर्म विगत लेखनी को बाँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !

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आज एक आकाश नीचे उतर आया

Dr. Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया
करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी,
अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा,
चित्त हुआ सरल, जो था कातर सा,
तन मन हुए भारहीन ,
निज पर की सीमा मिटी,
संकल्प विकल्प सारहीन ,
चेतना की सब धाराएं अंतर को प्रवाहित सी,
कुण्डलिनी ज्यूँ स्वयं की धुरी पर समाहित सी,
प्रेम बना दृष्टि, संवाद भी !
प्रतीक्षा बनी स्वभाव...
आज एक आकाश नीचे उतर आया...

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तृप्त

Dr. Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में, निश्चिंत!
क्या करूं अतिक्रमण, ठिठक के रह जाऊं,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,…
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं!

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आप बार बार आए

Dr. Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आए...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आए,
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए!

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मौन का साम्राज्य

Dr. Omendra Ratnu

मैंने देखा मौन का साम्राज्य,
वाणी के जगत के समानांतर,
धारण किये उसे भी,
किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य, अप्रभावित,
स्थापित एक वर्तुल में, स्वयं में लीन
विस्तीर्ण और अविभाज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ,
वाणी के भरता घाव स्थायित्व से ,
गर्भवती स्त्री सा,
स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे ,
पूरी सहिष्णुता से,
बिन राजा, बिन प्रजा, ये कैसा राज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ...
भासता निष्ठुर, किन्तु है करुणामय ,
बैठा अनमना सा,
ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही ,
निश्चिन्त उपवास में रत ,
देता प्रवेश निस्पंद, विदा भी, बिन क्रंदन ,
परम अद्वैत में स्थित,
न कुछ ग्राह्य, न त्याज्य!
मैंने देखा मौन का साम्राज्य

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महाशून्य के साथ

Dr. Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री! कन्या, भोली, कुंवारी!
हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़!
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई,
अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़!
रूप, गंध, स्पर्श, शब्द से विरस होकर, अरूप, निशब्द, अस्पर्शित, निर्धूम से नाता जोड़!
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ?
अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़!
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती,
प्रेम और करुणा के संग साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी !

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अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे

Dr. Omendra Ratnu

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह,
नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्ज़ी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !

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तू अब भी है

Dr. Omendra Ratnu

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें,
वजूद में मेरे घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तन्हाईयों में मगर , तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से अब फ़र्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनून में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है

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मन के मयूरा

Dr. Omendra Ratnu

नाच ओ मन के मयूरा नाच !
चेतना के ज्वार पे चढ़ ,
महालय के स्वाद को चख ,
निस्तब्धता के घुंघरुओं को जांच ,
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
काल वर्णी मेघ छाए,
मित्रता के हाथ आए ,
साँच को आती नहीं है आँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
माया पाश क्षीण पड़े ,
सुर नए विस्तीर्ण गढ़े,
कर्म विगत लेखनी को बाँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !

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आज एक आकाश नीचे उतर आया

Dr. Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया
करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी,
अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा,
चित्त हुआ सरल, जो था कातर सा,
तन मन हुए भारहीन ,
निज पर की सीमा मिटी,
संकल्प विकल्प सारहीन ,
चेतना की सब धाराएं अंतर को प्रवाहित सी,
कुण्डलिनी ज्यूँ स्वयं की धुरी पर समाहित सी,
प्रेम बना दृष्टि, संवाद भी !
प्रतीक्षा बनी स्वभाव...
आज एक आकाश नीचे उतर आया...

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तृप्त

Dr. Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में, निश्चिंत!
क्या करूं अतिक्रमण, ठिठक के रह जाऊं,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,…
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं!

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आप बार बार आए

Dr. Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आए...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आए,
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए!

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मौन का साम्राज्य

Dr. Omendra Ratnu

मैंने देखा मौन का साम्राज्य,
वाणी के जगत के समानांतर,
धारण किये उसे भी,
किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य, अप्रभावित,
स्थापित एक वर्तुल में, स्वयं में लीन
विस्तीर्ण और अविभाज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ,
वाणी के भरता घाव स्थायित्व से ,
गर्भवती स्त्री सा,
स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे ,
पूरी सहिष्णुता से,
बिन राजा, बिन प्रजा, ये कैसा राज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ...
भासता निष्ठुर, किन्तु है करुणामय ,
बैठा अनमना सा,
ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही ,
निश्चिन्त उपवास में रत ,
देता प्रवेश निस्पंद, विदा भी, बिन क्रंदन ,
परम अद्वैत में स्थित,
न कुछ ग्राह्य, न त्याज्य!
मैंने देखा मौन का साम्राज्य

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महाशून्य के साथ

Dr. Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री! कन्या, भोली, कुंवारी!
हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़!
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई,
अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़!
रूप, गंध, स्पर्श, शब्द से विरस होकर, अरूप, निशब्द, अस्पर्शित, निर्धूम से नाता जोड़!
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ?
अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़!
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती,
प्रेम और करुणा के संग साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी !

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अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे

Dr. Omendra Ratnu

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह,
नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्ज़ी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !

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तू अब भी है

Dr. Omendra Ratnu

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें,
वजूद में मेरे घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तन्हाईयों में मगर , तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से अब फ़र्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनून में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है

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मन के मयूरा

Dr. Omendra Ratnu

नाच ओ मन के मयूरा नाच !
चेतना के ज्वार पे चढ़ ,
महालय के स्वाद को चख ,
निस्तब्धता के घुंघरुओं को जांच ,
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
काल वर्णी मेघ छाए,
मित्रता के हाथ आए ,
साँच को आती नहीं है आँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
माया पाश क्षीण पड़े ,
सुर नए विस्तीर्ण गढ़े,
कर्म विगत लेखनी को बाँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !

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आज एक आकाश नीचे उतर आया

Dr. Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया
करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी,
अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा,
चित्त हुआ सरल, जो था कातर सा,
तन मन हुए भारहीन ,
निज पर की सीमा मिटी,
संकल्प विकल्प सारहीन ,
चेतना की सब धाराएं अंतर को प्रवाहित सी,
कुण्डलिनी ज्यूँ स्वयं की धुरी पर समाहित सी,
प्रेम बना दृष्टि, संवाद भी !
प्रतीक्षा बनी स्वभाव...
आज एक आकाश नीचे उतर आया...

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तृप्त

Dr. Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में, निश्चिंत!
क्या करूं अतिक्रमण, ठिठक के रह जाऊं,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,…
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं!

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आप बार बार आए

Dr. Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आए...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आए,
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए!

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मौन का साम्राज्य

Dr. Omendra Ratnu

मैंने देखा मौन का साम्राज्य,
वाणी के जगत के समानांतर,
धारण किये उसे भी,
किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य, अप्रभावित,
स्थापित एक वर्तुल में, स्वयं में लीन
विस्तीर्ण और अविभाज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ,
वाणी के भरता घाव स्थायित्व से ,
गर्भवती स्त्री सा,
स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे ,
पूरी सहिष्णुता से,
बिन राजा, बिन प्रजा, ये कैसा राज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ...
भासता निष्ठुर, किन्तु है करुणामय ,
बैठा अनमना सा,
ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही ,
निश्चिन्त उपवास में रत ,
देता प्रवेश निस्पंद, विदा भी, बिन क्रंदन ,
परम अद्वैत में स्थित,
न कुछ ग्राह्य, न त्याज्य!
मैंने देखा मौन का साम्राज्य

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महाशून्य के साथ

Dr. Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री! कन्या, भोली, कुंवारी!
हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़!
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई,
अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़!
रूप, गंध, स्पर्श, शब्द से विरस होकर, अरूप, निशब्द, अस्पर्शित, निर्धूम से नाता जोड़!
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ?
अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़!
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती,
प्रेम और करुणा के संग साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी !

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अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे

Dr. Omendra Ratnu

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह,
नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्ज़ी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !

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तू अब भी है

Dr. Omendra Ratnu

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें,
वजूद में मेरे घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तन्हाईयों में मगर , तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से अब फ़र्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनून में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है

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मन के मयूरा

Dr. Omendra Ratnu

नाच ओ मन के मयूरा नाच !
चेतना के ज्वार पे चढ़ ,
महालय के स्वाद को चख ,
निस्तब्धता के घुंघरुओं को जांच ,
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
काल वर्णी मेघ छाए,
मित्रता के हाथ आए ,
साँच को आती नहीं है आँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
माया पाश क्षीण पड़े ,
सुर नए विस्तीर्ण गढ़े,
कर्म विगत लेखनी को बाँच !
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आज एक आकाश नीचे उतर आया

Dr. Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया
करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी,
अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा,
चित्त हुआ सरल, जो था कातर सा,
तन मन हुए भारहीन ,
निज पर की सीमा मिटी,
संकल्प विकल्प सारहीन ,
चेतना की सब धाराएं अंतर को प्रवाहित सी,
कुण्डलिनी ज्यूँ स्वयं की धुरी पर समाहित सी,
प्रेम बना दृष्टि, संवाद भी !
प्रतीक्षा बनी स्वभाव...
आज एक आकाश नीचे उतर आया...

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तृप्त

Dr. Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में, निश्चिंत!
क्या करूं अतिक्रमण, ठिठक के रह जाऊं,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,…
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं!

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आप बार बार आए

Dr. Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आए...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आए,
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए!

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मौन का साम्राज्य

Dr. Omendra Ratnu

मैंने देखा मौन का साम्राज्य,
वाणी के जगत के समानांतर,
धारण किये उसे भी,
किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य, अप्रभावित,
स्थापित एक वर्तुल में, स्वयं में लीन
विस्तीर्ण और अविभाज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ,
वाणी के भरता घाव स्थायित्व से ,
गर्भवती स्त्री सा,
स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे ,
पूरी सहिष्णुता से,
बिन राजा, बिन प्रजा, ये कैसा राज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ...
भासता निष्ठुर, किन्तु है करुणामय ,
बैठा अनमना सा,
ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही ,
निश्चिन्त उपवास में रत ,
देता प्रवेश निस्पंद, विदा भी, बिन क्रंदन ,
परम अद्वैत में स्थित,
न कुछ ग्राह्य, न त्याज्य!
मैंने देखा मौन का साम्राज्य

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महाशून्य के साथ

Dr. Omendra Ratnu

अरी ओ आत्मा री! कन्या, भोली, कुंवारी!
हुआ खेल पूरा अब तो मन से सम्बन्ध तोड़!
महाशून्य के साथ तेरी सगाई रची गई,
अब तो चैतन्य की भटकती दिशा मोड़!
रूप, गंध, स्पर्श, शब्द से विरस होकर, अरूप, निशब्द, अस्पर्शित, निर्धूम से नाता जोड़!
वासना की ताल पे नाचती थकी नहीं तू ?
अब तो इस मायाजाल को इसी के सर फोड़!
कर्तत्व के बोझ से क्यूँ मरी जाती,
प्रेम और करुणा के संग साक्षी का रस निचोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! स्वच्छंद ! श्वेत्वरनी ! काल के घने मंडराते बादलों को छोड़ !
अरी ओ आत्मा री ! कन्या भोली कुंवारी !

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अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे

Dr. Omendra Ratnu

अब प्यार हुआ इलज़ाम यहाँ, है मक्कारों की पौ बारह,
नफरत में जीना आसान है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
क्या शोर हुआ, क्या ज़ोर हुआ,यूँ मर मर के मैं और हुआ,
बस बाकी होश ज़रा सा है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
कोई आँख भरी ना ठंडक से, कोई हाथ नहीं है कंधे पर,
हर शख्स यहाँ घबराया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
ना सत्य सुना,ना वाद सुना, ना कल कल जल का नाद सुना,
इक कर्कश स्वर भर आया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
करुणा की गंध भी महकी थी, मुक्ति की हवा भी बहकी थी,
खुदगर्ज़ी ने भरमाया है, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !
तलवार उठा और बाँध कमर, अब आँख उठा और देख सहर,
आने वाली नस्लें न कहें, अफ़सोस कहाँ हम आ पहुँचे !

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तू अब भी है

Dr. Omendra Ratnu

सब लुट गया तो क्या, तू अब भी है,
अँधेरी रातों में तेरी महक अब भी है !
टूटती नहीं ये खुमारी क्या करें,
वजूद में मेरे घुली मिली, तू अब भी है !
जानता हूँ खूब नज़र फिर गयी तेरी,
दिल की तन्हाईयों में मगर , तू अब भी है !
तेरे होने, ना होने से अब फ़र्क नहीं कोई,
इस आशिकी के जुनून में ,तू अब भी है !
दौर-ए-हिज्र में हालांकि हुए घायल,
एहसास-ए-शुक्रमंदी में, तू अब भी है !
तिजारत की दुनिया रखे हिसाब तेरा,
इश्क में आज़ाद तू तब भी थी , तू अब भी है

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मन के मयूरा

Dr. Omendra Ratnu

नाच ओ मन के मयूरा नाच !
चेतना के ज्वार पे चढ़ ,
महालय के स्वाद को चख ,
निस्तब्धता के घुंघरुओं को जांच ,
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
काल वर्णी मेघ छाए,
मित्रता के हाथ आए ,
साँच को आती नहीं है आँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !
माया पाश क्षीण पड़े ,
सुर नए विस्तीर्ण गढ़े,
कर्म विगत लेखनी को बाँच !
नाच ओ मन के मयूरा नाच !

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आज एक आकाश नीचे उतर आया

Dr. Omendra Ratnu

आज एक आकाश नीचे उतर आया
करने आच्छादित मुझे, मेरे उपरान्त भी,
अस्तित्व हुआ तरल झीनी चादर सा,
चित्त हुआ सरल, जो था कातर सा,
तन मन हुए भारहीन ,
निज पर की सीमा मिटी,
संकल्प विकल्प सारहीन ,
चेतना की सब धाराएं अंतर को प्रवाहित सी,
कुण्डलिनी ज्यूँ स्वयं की धुरी पर समाहित सी,
प्रेम बना दृष्टि, संवाद भी !
प्रतीक्षा बनी स्वभाव...
आज एक आकाश नीचे उतर आया...

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तृप्त

Dr. Omendra Ratnu

उठूँ तुझे छूने को, लालायित मन से आऊँ ,
पा के तुझे प्रगाढ़ विश्राम में, निश्चिंत!
क्या करूं अतिक्रमण, ठिठक के रह जाऊं,
करवट से तेरी उठी हलचल के स्पंदन में ही,…
अनुभूत हो तेरा स्पर्श, मैं तृप्त लौट जाऊं!

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आप बार बार आए

Dr. Omendra Ratnu

लौट के ना वहाँ से कोई इस पार आए,
पर इस दिवाली पे आप बार बार आए...
वो देरी से उठने पे मीठे उलाहने,
हर दस्तूर के हमको समझाना माने,
स्मृतियों की पालकी सपनों के कहार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए
वो मुहूरत में देरी पे जल्दी मचाना,
वो रूठे हुओं को मनाना हँसाना,
कितने भटके हुओं को उबार लाये
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो बढ़ बढ़ के सबका पटाखे दिखाना
वो बहुओं का दिन भर यूँ खाने बनाना,
अब किसी को भी क्यूँ वो दुलार आए,
इस दिवाली पे आप बार बार आए।
वो भजनों की वाणी पे ध्यानस्थ होना,
वो डिंगल के दोहों का कंठस्थ होना,
कितनी बिगड़ी हुई बातें सुधार लाये,
इस दिवाली पे आप बार बार आए!

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मौन का साम्राज्य

Dr. Omendra Ratnu

मैंने देखा मौन का साम्राज्य,
वाणी के जगत के समानांतर,
धारण किये उसे भी,
किन्तु अस्पर्शित, अभेद्य, अप्रभावित,
स्थापित एक वर्तुल में, स्वयं में लीन
विस्तीर्ण और अविभाज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ,
वाणी के भरता घाव स्थायित्व से ,
गर्भवती स्त्री सा,
स्वयं से ठीक विपरीत को पोषण दे ,
पूरी सहिष्णुता से,
बिन राजा, बिन प्रजा, ये कैसा राज्य !
मैंने देखा मौन का साम्राज्य ...
भासता निष्ठुर, किन्तु है करुणामय ,
बैठा अनमना सा,
ढोता ब्रह्माण्ड को सहज ही ,
निश्चिन्त उपवास में रत ,
देता प्रवेश निस्पंद, विदा भी, बिन क्रंदन ,
परम अद्वैत में स्थित,
न कुछ ग्राह्य, न त्याज्य!
मैंने देखा मौन का साम्राज्य

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