Manoj Krishnan

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अल्पविराम

Manoj Krishnan

जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उसकी बेचैन आँखों को चोरी से देख लूंगा।
जिनसे दुनिया, सहमी हुई, फिरती दिखेगी,
उनमें समा कर, शायद थोड़ी ख़ुशी मिलेगी।
थोड़ा तो ज्ञात है मुझे, उसकी भी मनोदशा,
उसे क्या पता इस आंलिगन का भी है मज़ा।
कब से प्रतीक्षा है मुझे इस अंतिम घङी की,
उसके स्पर्श एवं उसमें विलीन हो जाने की।
रह जाएंगी मेरी यादें और मेरे कुछ अवशेष,
अति सुखद होगा इस एकांकी का पटाक्षेप।
इस तरह मेरी ये कहानी समाप्त हो जायेगी,
पर, अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।
संभवतः आपके लिए ये वदनापूर्ण विषय हो,
हो सकता है थोड़ी असमंजस एवं संशय हो।
परन्तु, इसको मैं परमोक्ष की प्राप्ति मानूंगा,
मृत्यु का वरण कर, जीवन का अर्थ जानूंगा।
जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उन होंठों की कम्पन को, हौले से पढ़ लूंगा।
मृत्यु के चेहरे पर आती ये शिकन बताएंगी,
इक अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।

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अल्पविराम

Manoj Krishnan

जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उसकी बेचैन आँखों को चोरी से देख लूंगा।
जिनसे दुनिया, सहमी हुई, फिरती दिखेगी,
उनमें समा कर, शायद थोड़ी ख़ुशी मिलेगी।
थोड़ा तो ज्ञात है मुझे, उसकी भी मनोदशा,
उसे क्या पता इस आंलिगन का भी है मज़ा।
कब से प्रतीक्षा है मुझे इस अंतिम घङी की,
उसके स्पर्श एवं उसमें विलीन हो जाने की।
रह जाएंगी मेरी यादें और मेरे कुछ अवशेष,
अति सुखद होगा इस एकांकी का पटाक्षेप।
इस तरह मेरी ये कहानी समाप्त हो जायेगी,
पर, अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।
संभवतः आपके लिए ये वदनापूर्ण विषय हो,
हो सकता है थोड़ी असमंजस एवं संशय हो।
परन्तु, इसको मैं परमोक्ष की प्राप्ति मानूंगा,
मृत्यु का वरण कर, जीवन का अर्थ जानूंगा।
जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उन होंठों की कम्पन को, हौले से पढ़ लूंगा।
मृत्यु के चेहरे पर आती ये शिकन बताएंगी,
इक अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।

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अल्पविराम

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जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उसकी बेचैन आँखों को चोरी से देख लूंगा।
जिनसे दुनिया, सहमी हुई, फिरती दिखेगी,
उनमें समा कर, शायद थोड़ी ख़ुशी मिलेगी।
थोड़ा तो ज्ञात है मुझे, उसकी भी मनोदशा,
उसे क्या पता इस आंलिगन का भी है मज़ा।
कब से प्रतीक्षा है मुझे इस अंतिम घङी की,
उसके स्पर्श एवं उसमें विलीन हो जाने की।
रह जाएंगी मेरी यादें और मेरे कुछ अवशेष,
अति सुखद होगा इस एकांकी का पटाक्षेप।
इस तरह मेरी ये कहानी समाप्त हो जायेगी,
पर, अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।
संभवतः आपके लिए ये वदनापूर्ण विषय हो,
हो सकता है थोड़ी असमंजस एवं संशय हो।
परन्तु, इसको मैं परमोक्ष की प्राप्ति मानूंगा,
मृत्यु का वरण कर, जीवन का अर्थ जानूंगा।
जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उन होंठों की कम्पन को, हौले से पढ़ लूंगा।
मृत्यु के चेहरे पर आती ये शिकन बताएंगी,
इक अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।

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जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उसकी बेचैन आँखों को चोरी से देख लूंगा।
जिनसे दुनिया, सहमी हुई, फिरती दिखेगी,
उनमें समा कर, शायद थोड़ी ख़ुशी मिलेगी।
थोड़ा तो ज्ञात है मुझे, उसकी भी मनोदशा,
उसे क्या पता इस आंलिगन का भी है मज़ा।
कब से प्रतीक्षा है मुझे इस अंतिम घङी की,
उसके स्पर्श एवं उसमें विलीन हो जाने की।
रह जाएंगी मेरी यादें और मेरे कुछ अवशेष,
अति सुखद होगा इस एकांकी का पटाक्षेप।
इस तरह मेरी ये कहानी समाप्त हो जायेगी,
पर, अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।
संभवतः आपके लिए ये वदनापूर्ण विषय हो,
हो सकता है थोड़ी असमंजस एवं संशय हो।
परन्तु, इसको मैं परमोक्ष की प्राप्ति मानूंगा,
मृत्यु का वरण कर, जीवन का अर्थ जानूंगा।
जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उन होंठों की कम्पन को, हौले से पढ़ लूंगा।
मृत्यु के चेहरे पर आती ये शिकन बताएंगी,
इक अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।

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जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उसकी बेचैन आँखों को चोरी से देख लूंगा।
जिनसे दुनिया, सहमी हुई, फिरती दिखेगी,
उनमें समा कर, शायद थोड़ी ख़ुशी मिलेगी।
थोड़ा तो ज्ञात है मुझे, उसकी भी मनोदशा,
उसे क्या पता इस आंलिगन का भी है मज़ा।
कब से प्रतीक्षा है मुझे इस अंतिम घङी की,
उसके स्पर्श एवं उसमें विलीन हो जाने की।
रह जाएंगी मेरी यादें और मेरे कुछ अवशेष,
अति सुखद होगा इस एकांकी का पटाक्षेप।
इस तरह मेरी ये कहानी समाप्त हो जायेगी,
पर, अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।
संभवतः आपके लिए ये वदनापूर्ण विषय हो,
हो सकता है थोड़ी असमंजस एवं संशय हो।
परन्तु, इसको मैं परमोक्ष की प्राप्ति मानूंगा,
मृत्यु का वरण कर, जीवन का अर्थ जानूंगा।
जब भी मौत आएगी मेरी, मैं उसे चूम लूंगा,
उन होंठों की कम्पन को, हौले से पढ़ लूंगा।
मृत्यु के चेहरे पर आती ये शिकन बताएंगी,
इक अल्पविराम के बाद कथा नयी आएगी।

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